Home संपादकीय पल्स Can not make anything, Do not waste anything: कुछ बना नही सकते, तो बर्बाद मत करिये

Can not make anything, Do not waste anything: कुछ बना नही सकते, तो बर्बाद मत करिये

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दो माह पहले दिल्ली के एक पंच सितारा होटल में हमारे एक पुराने मित्र मिले। दिल्ली के एक अच्छे इलाके में फ्लैट लिया था, वहीं रह रहे हैं। हालचाल पूछने पर बोले सब अच्छा है। जेट एयरवेज में पायलट की नौकरी है। आज उसका फोन आया तो रो पड़े। बोले, भाई फ्लैट की किस्त तीन महीने से नहीं दे पाया हूं। बैंक लोन का नोटिस आ गया है। डीजीएम से बात करके कुछ वक्त दिला दो। कंपनी बंद हो गई है, पिछले चार माह से वेतन भी नहीं मिला है। इस वक्त मार्केट में नौकरी भी नहीं है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं? यह सिर्फ एक युवा का दर्द नहीं बल्कि ऐसे तमाम उद्योगों और संस्थानों में काम करने वालों की हालत खराब है। निजी उपक्रमों के साथ ही सरकारी उपक्रमों (पीएसयू) भी बदतर हो रही है। पिछले पांच सालों में बर्बादी की रफ्तार कम होने के बजाय बढ़ी है। वजह साफ है कि हमारी सरकार की नीतियों ने सरकारी उपक्रमों को संबल देकर सुधारने के बजाय उन्हें गलत राह पर ढकेल दिया है। नतीजतन बीमार हो चुके इन सरकारी उद्यमों में कार्यरत लाखों लोगों का रोजगार संकट में फंस गया है। उद्योग बंदी की कगार पर हैं।
संसद के शीतकालीन सत्र में कैग ने पीएसयू (सार्वजनिक उपक्रम) को लेकर अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया कि 2014-15 के वित्तीय सत्र में 132 सार्वजनिक उपक्रमों को 30861 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ था। जो 2016-17 वित्तीय वर्ष में बढ़कर 104730 करोड़ रुपए हो गया है। औसतन सालाना 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक का शुद्ध घाटा जुड़ रहा है। इसकी वजह खराब प्रबंधन और दूरगामी नीतियों का अभाव है। कैग ने एक हजार करोड़ से ज्यादा के नुकसान वाली सरकारी कंपनियों की अलग से रिपोर्ट बनाई है। सबसे अहम बात तो यह है कि लाभ कमाने वाली कंपनियां भी नुकसान में आ गईं हैं। स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया (सेल) को 3187 करोड़ का घाटा हुआ जबकि एमटीएनएल को 2941 करोड़, हिंदुस्तान फोटोफिल्म्स कंपनी लिमिटेड को 2917 करोड़, यूनाइडेट इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1914 करोड़ और ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1691 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यही नहीं सरकारी नियंत्रण वाली 173 कंपनियों में से 41 को 2016-17 में 4308 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। मार्च 2017 में देश में 636 सार्वजनिक उपक्रम कंपनियां (सीपीएसई) थीं, जिसमें 438 सरकारी कंपनियों के तौर पर सूचीबद्ध थी और छह वैधानिक निकाय और 192 कंपनियां अन्य तरह के सरकारी नियंत्रण में थीं। इनमें कुछ ही कंपनियां आर्थिक रूप से इस हालत में हैं कि वो सरकार को फायदा दे सकें। तकरीबन 80 फीसदी की हालत खराब है।
सरकारी उपक्रमों की हालत एक दिन में खराब नहीं हुई है। मोदी सरकार ने अपने नाम के चक्कर में सही दिशा में चल रही नीतियों से छेड़छाड़ की, जिसका नतीजा यह हुआ कि सुधार के बजाय हम बर्बादी की राह चल दिए। बीएसएनएल के पास इतनी संपत्ति है कि वह एक धनी सार्वजनिक कंपनी है। सरकार ने उसे आगे बढ़ाने के बजाय निजी टेलीकाम कंपनियों को बढ़ाया। इस नीति ने बीएसएनएल को बीमारू उद्योग की श्रेणी में ला दिया। एचएएल काम के अभाव में कंगाली से जूझ रहा है। सरकार उसके काम निजी क्षेत्र की कंपनियों से करवा रही है। अब डाक विभाग की हालत पतली है। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आयुध फैक्ट्रियों की हालत भी पतली है। उत्पादों की मांग घटने से ये फैक्ट्रियां भी संकट में पड़ गई हैं। हमारी सरकार आयुध उत्पाद अपने यहां विकसित कराने के बजाय विदेशी कंपनियों से निर्यात पर अधिक भरोसा कर रही है। मोदी सरकार के रक्षा क्षेत्र में भारी विदेशी खरीद के फैसले ने घरेलू रक्षा उत्पादों की रीढ़ तोड़ दी। रक्षा या दूसरे क्षत्रों के जो उत्पाद हम अपने उद्योगों में विकसित कर बना सकते थे, उन्हें भी हम आगे नहीं बढ़ा पाये। कंपनियों में काम न होने उनका भविष्य संकट में फंस गया है।
मोदी सरकार लाने के लिए देशवासियों ने उत्साह से मतदान किया था, जिससे वे सकारात्मक बदलाव लायें। पिछली सरकारों की कमियों का रोना रोने के बजाय सही दिशा में अच्छी पारदर्शी नीति से काम करें। बीमार सार्वजनिक उद्योगों और उपक्रमों को प्रोफेसनल्स की मदद से रोगमुक्त बनाकर मजबूती से खड़ा करें। इन संस्थाओं की संपत्तियों को बेचने के बजाय उनका व्यवसायिक इस्तेमाल कर आमदनी बढ़ायें। दुखद यह है कि सरकार ने इन मूल समस्याओं के समाधान के लिए काम करने के बजाय सिर्फ अपनी ब्रांडिंग पर जोर दिया। नीतियां रचनात्मक बनाने के बजाय संकटकारक बनाई गईं। सुधार के नाम पर जो कदम उठाये गये, वो हमारी अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए घातक सिद्ध हुए। शोध की दिशा में काम नहीं हो पाया। जो उच्च शोध संस्थान हैं, वहां के विज्ञानी सिर्फ अपनी नौकरी बचाने में जुटे हैं क्योंकि सरकार की असफलताएं उनके सिर मढ़ी जा रही हैं। युवाओं को रोजगार देने के नाम पर जो भी योजनायें बनाई गईं, असल में वो न युवाओं को सुयोग्य रोजगार दे सकीं और न उन्हें उसके लिए उपयुक्त माहौल। सरकार पर निगरानी करने वाली संस्थाओं को मारा जा रहा है।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ससटेनेबल इम्पलॉयमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के फैसले से देश के 50 लाख लोगों का रोजगार छिन गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल 50 लाख व्यवसायिक शिक्षित युवा बेरोजगारों की फौज में जुड़ रहे हैं। कृषि क्षेत्र में जरूरत से 70 गुणा अधिक लोग काम करते हैं। मनमानी तरीके से लागू किये गये जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र के दो करोड़ लोगों को बर्बादी के रास्ते खड़ा कर दिया है। इतना सब होने के बाद भी सरकार सुधार के कदम उठाने के बजाय देश की भीड़ को नकारात्मक दिशा दिखा रही है। जो देश के भविष्य के लिए खतरनाक होगा। सरकार को इन खतरों से निपटने के लिए सही और योजनागत राह अपनानी होगी, जिससे नियोजित तरीके से न केवल बीमारू उद्योगों को सेहतमंद बनाया जा सके बल्कि रोजगार के नये अवसर पैदा किये जा सकें। हमें कॉरपोरेट के मायाजाल से निपटने की सरकारी नीति भी बनानी होगी। इसके लिए नागरिकों की मांग के मुताबिक सशक्त सार्वजनिक उपक्रम तैयार करने होंगे। हमारे देश में न योग्य युवाओं की कमी है और न ही संस्थानों की।
सत्तारूढ़ दल की यह महती जिम्मेदारी है कि वह सभी के लिए समान योग्य व्यवस्था बनाये। संस्थानों को कमजोर करने के बजाय उन्हें मजबूत करे। उद्योगों और उद्यमियों के लिए सुखद माहौल तैयार करे, जिससे रोजगार के भरपूर अवसर मिलें। सरकार बेहतरीन शिक्षा और प्रशिक्षण के संस्थान सांकेतिक फीस पर उपलब्ध कराये। महिलाओं-बच्चों के लिए मित्रवत माहौल बने। किसानों की लागत शून्य की जाये और उनकी उपज की इतनी कीमत मिले, जिससे वो भी खुशहाली में जीवन जी सकें। असंगठित क्षेत्र के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा और काम के अवसर उपलब्ध हों। जब तक आम नागरिक को बेहतर जीवन की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक संविधान की कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूर्ण नहीं होगी। दुख तब होता है, जब हम देखते हैं कि सरकारें उस दिशा में काम करने के बजाय कुछ समूहों के हित में काम करती हैं। ऐसे समूहों को फायदा पहुंचाने के लिए जनता को बर्बादी की राह में ढकेलती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि अगर हमारे नीति नियंता कुछ नया नहीं बना सकते तो उन्हें बर्बाद करने का हक तो बिल्कुल नहीं है, क्योंकि वे मालिक नहीं हमारे प्रतिनिधि हैं। जिन संस्थाओं और उद्योगों से हमारे देश और देशवासियों को शक्ति मिलती है उनकी संरक्षा करना उनकी महती जिम्मेदारी है।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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