Home संपादकीय पल्स Bring forth the truth is essential in national interest: सच को सामने लाना राष्ट्रहित में आवश्यक

Bring forth the truth is essential in national interest: सच को सामने लाना राष्ट्रहित में आवश्यक

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ऋग्वेद दिशानिर्देश देता है कि राष्ट्र का संचालन करने वाला व्यक्ति विद्वान हो और संपूर्ण राष्ट्र की उसके प्रति निष्ठा एवं विश्वास हो। राष्ट्र संचालक को पिता की तरह सभी के हित के लिए प्रतिबद्ध होने के साथ ही संरक्षण देने वाला होना चाहिए। किसी को बड़ा या छोटा समझने की गलती नहीं करनी चाहिए बल्कि सभी के प्रति समभाव होना चाहिए। उसे सत्य और निष्ठा के साथ राष्ट्रहित में काम करना चाहिए, न कि कुछ समुदाय और जनों के हित में। लंबे वक्त से भारत को उसके स्वर्णिम काल का सम्मान वापस लाने की चर्चाएं होती रही हैं मगर दुख तब होता है जब ये चर्चाएं सिर्फ बातों में ही सिमट जाती हैं। हमारे कुछ लोग व्यक्ति भक्ति में लीन हो जाते हैं कि उसे ही राष्ट्रभक्ति समझने लगते हैं। सत्य का संवाद खत्म होने लगता है। बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि राष्ट्रहित में सत्य को सामने लाने के लिए अगर गलत राह पर भी चलना पड़े तो यह अपराध नहीं होता। राष्ट्र सर्वोपरि है। उसके हितों को साधना सभी देशवासियों की जिम्मेदारी है। ऋग्वेद का कहना है..ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदो ऽमध्यमासो महसा वि वार्व्धु:, सुजातासो जनुषा पर्श्निमातरो दिवो मर्या आ नो अछा जिगातन!! अर्थात राष्ट्रभक्तों में बड़ा या छोटा होने की भावना के बजाय राष्ट्रहित में सद्भाव के साथ प्रगति के लिए काम करना चाहिए।राफेल डील को लेकर द हिंदू अखबार ने कई खोजी खबरें छापीं। उन खबरों को आधार बनाकर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर डील की जांच कराने की मांग रखी। अदालत में केंद्र सरकार के महान्यावादी ने कहा कि जिन दस्तावेजों के आधार पर यह खबरें छपी हैं, वो रक्षा मंत्रालय से चोरी किए गए थे। यह दस्तावेज अति गोपनीय हैं। आॅफीसियल सीक्रेट एक्ट के तहत यह अपराध की श्रेणी में आता है। इन खबरों के स्रोत पर जांच कराए जाने के साथ ही अखबार के संपादकीय निदेशक एन राम के खिलाफ कार्रवाई की जाए। संभव है दस्तावेज चोरी किए गए हों और यह कृत्य गोपनीयता के तहत आता हो। सच तो यह है कि इन दस्तावेजों का इस्तेमाल राष्ट्रहित में सच को सामने लाने के लिए किया गया। एक बड़ी रक्षा डील पर घोटाले के जो आरोप लगे, इस अखबार ने उस पर पड़े तमाम पर्दों को उठाकर ईमानदार पत्रकारिता का परिचय दिया जो राष्ट्र को धोखे से बचाने की एक कोशिश थी। इस मामले में अगर किसी भी आधार पर अखबार या उसकी संपादकीय टोली पर कार्यवाही की जाती है तो वह लोकतंत्र के उस आधार को नष्ट करने वाली होगी, जो सच को सामने लाने का काम करती है। एन राम ने जिस ईमानदारी का परिचय दिया और तथ्यों को सामने लाए, उसके लिए उनके खिलाफ मुकदमा नहीं सम्मान मिलना चाहिए।कई बार हमारे हित चिंतक हमसे कहते हैं कि इतना सच मत बोलो, संकट में फंस जाओगे। हम उनकी मनोभावना और सद्भावना की कद्र करते हैं मगर यह भी कहना चाहते हैं कि अगर हम ही सच से भागेंगे तो सिर्फ झूठ बिकेगा। हमारा धर्म है कि हम सच बोलें और लिखें भी। किसी की सहमति और असहमति हमारे लिए मायने नहीं रखनी चाहिए। हमारे जीवन या किसी अन्य हित को अगर इससे खतरा होता है तो भी नहीं डरना चाहिए। तुलसीदास ने रामचरित मानस में स्पष्ट किया है.. हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ! हम अगर भारतीय मनीषियों के विचारों पर विश्वास करते हैं तब तो हमें डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं। बीते दिनों हमने सोशल मीडिया पर यह बात कही भी कि पत्रकार को आलोचनाओं, धमकियों और हमलों से नहीं डरना चाहिए। वैसे जरूरी नहीं कि हर कोई हमारे मंतव्य से सहमत हो। कितना भी झूठ बोलो सच को बदलना संभव नहीं। झूठ एक स्थान और कुछ शक्तियुक्त लोगों का हथियार हो सकता है मगर सर्वत्र नहीं। हम वैश्विक दुनिया में जी रहे हैं, जहां हमें अपनों के अलावा दूसरे भी देखते और परखते हैं। इन हालात में जब हम सच पर केंद्रित होंगे और उसे सामने लाने का संघर्ष करेंगे तो देर सबेर जीतेंगे, शर्त सिर्फ इतनी है कि हम दुर्भावना से ग्रसित न हों। यह वक्त न केवल सच बोलने का है बल्कि सच को सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करने का भी है क्योंकि सच को छिपाया भी जा रहा है और तोड़ा मरोड़ा भी। भारतीय मीडिया विश्वसनीयता खोने के हर मौके को अजमा रहा है, जो उसके भविष्य के लिए घातक है। फौरी या फिर कुछ लाभ के लिए मीडिया बगैर जांचे परखे तमाम ऐसे तथ्य प्रस्तुत कर रहा है जो एक एजेंडे की तरह गढ़े गए हैं। कुछ लोग ऐसे मीडिया को भक्त या गोदी मीडिया कहते हैं। जो मीडिया सच दिखाने की कोशिश करता है, उसको भक्ति रस में रचे लोग गद्दार की संज्ञा देते हैं। ऐसे लोग गालियों का भी प्रयोग करने से नहीं हिचकते। वे भारतीयता की बात करते हैं मगर संस्कारविहीन हो जाते हैं। इसका उत्तर तुलसीदास ने रामचरित मानस में दिया है.. जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। सच बोलने-लिखने वाले को डरने की जरूरत नहीं है। कई बार अग्निपरीक्षा देनी पड़ सकती है मगर वह भी तो योग्य ही देते हैं, अयोग्य नहीं। वैश्विक जगत में हमारे पास इतने साधन उपलब्ध हैं कि हम चंद मिनटों में ही सही गलत की समीक्षा कर सकते हैं। मीडिया को दोष देने के बजाय हम उस साधन का इस्तेमाल करें और सच जानें, जो आपका हक है।डिजिटल युग में बदलाव के दौर में जरूरत है अपनी साख बचाये रखना। राष्ट्रहित में सच को प्रस्तुत करना। इसके लिए कोई बड़ा सुपर कंप्युटर नहीं चाहिए बल्कि ईमानदारी की जरूरत है। हम सच को खोजें और उसे जैसा है जहां है प्रस्तुत कर दें। उसको पढ़ने वाला हो या देखने वाला, समझदार है। सच की मीमांशा उसे करने दीजिए, आप जज मत बनिये। राष्ट्रीयता की भावना होना अच्छा है। मगर राष्ट्रवादी होने से बहुत अच्छा है राष्ट्रभक्त होना। व्यक्तिवाद आपको एकांकी कर देगा। आप और हमारा राष्ट्र इस एकांकीपन में अपनी सभ्यता-संस्कृति खो देगा, जिसे स्थापित करने में हजारों साल लगे थे।

जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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