Home संपादकीय उत्‍तरप्रदेश में ‘कोटे में कोटा’ देकर बड़ा खेल खेलने की तैयारी में है भाजपा

उत्‍तरप्रदेश में ‘कोटे में कोटा’ देकर बड़ा खेल खेलने की तैयारी में है भाजपा

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अजय कुमार

सियासत में हर जोड़ का तोड़ मौजूद है। इस ‘जोड़−तोड़’ का रंग कभी चटक दिखता है तो कभी फीका नजर आता है। सब कुछ चुनावी टाइमिंग पर निर्भर करता है। अगले वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं। चुनाव के लिये बमुश्किल साल भर का समय बचा है। ऐसे में कोई भी पार्टी या नेता किसी भी तरह के सियासी हथकंडा अपनाने से गुरेज नहीं कर रहा है। आम चुनाव की आहट ने ही सपा−बसपा जैसे दो परस्पर विरोधी दलों को एक झंडे के नीचे खड़ा कर दिया। जिसका इन एक हुए दलों के पक्ष में सुखद परिणाम गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा के उप−चुनाव में सामने आया। दोनों ही सीटें सपा की झोली में आ गिरीं। सपा−बसपा एक हुए तो बीजेपी को झटका लगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि बीजेपी ने हार मान ली थी। इसीलिये तो योगी सरकार सरकारी नौकरियों में अति पिछड़ों और अति दलितों को कोटे में कोटा देने की बात करने लगी है। मकसद यही है कि कोटे में कोटा देकर सपा−बसपा गठबंधन की हवा निकाली जा सके। यूपी में पिछड़ों की आबादी लगभग 47 प्रतिशत है इसमें भी 30 प्रतिशत अति पिछड़े यानी गैरयादव और गैरकुर्मी हैं। कुर्मी तो बीजेपी के साथ हैं, लेकिन आरक्षण के नाम पर बीजेपी की कोशिश गैर यादव वोट बैंक को साधने की है।

इसके अलावा बीजेपी ने 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े 131 मामले वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करके हिन्दुत्व की हांडी सियासी चूल्हे पर पकाना शुरू कर दी है। यह सभी मामले दंगों के समय हिन्दुओं पर दर्ज किये गये थे। बीजेपी के क्षेत्रीय सांसद संजीव बालियान ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह मुकदमे वापस करने की मांग की थी। उनका कहना था सपा सरकार ने साजिशन हिन्दुओं पर मुकदमे दर्ज किए थे, जबकि यह तमाम लोग तो यहां रहते भी नहीं थे। सीएम ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी से इस संबंध में आख्या मांगी है। 131 केस वापस लेने का तानाबाना बुन कर योगी सरकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दू वोट बैंक की एकजुटता को मजबूत करना चाहती है।

एक तरफ योगी ने चुनावी सुगबुगाहट के बीच अति पिछड़ों, अति दलितों का राग अलापना शुरू किया तो उधर कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ माहौल गरमाने में लग गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया था जिसके अनुसार एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों को नरम बनाते हुए उसके द्वारा आदेश दिया था कि इस एक्ट में मुकदमा दर्ज होने पर आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में लोक सेवक की गिरफ्तारी से पूर्व पुलिस उपाधीक्षक रैंक के अधिकारी से प्राथमिक जांच जरूर कराई जाये। साथ ही कोर्ट ने आम आदमी को राहत देते हुए इसमें अग्रिम जमानत की व्यवस्था कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ मोदी सरकार पुनर्विचार याचिका दायर कर रही है, परंतु कांग्रेस के युवराज वोट बैंक की सियासत के चक्कर में आग उगलने लगे और अपने सांसदों के साथ संसद परिसर में धरना तक दे डाला। संभवतः राहुल को लगता है कि वह ऐसा करके एससी/एसटी वोटरों को अपने पाले मे खड़ा कर सकते हैं। यह सब खेल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये खेला जा रहा है।

बात कोटे में कोटे की कि जाये तो ऐसा लगता है यूपी में जातिवाद की सियासत पूरे शबाब पर है इसीलिये तो 17 वर्षों के बाद उत्तर प्रदेश में एक बार फिर कोटे में कोटा की सियासत तेज हो गई है। सीएम योगी के एक बयान ने अति दलित/अति पिछड़ों को सुनहरे सपने दिखा दिये हैं तो वहीं कोटे में कोटा के माध्यम से बीजेपी, समाजवादी पार्टी और बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी करने का भी सपना पाले हुए है। 2001 में सीएम रहते जो काम बीजेपी नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह नहीं कर पाये थे अब वही काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करना चाह रहे हैं। गत दिनों योगी ने जब यूपी विधानसभा में कहा कि सरकार प्रदेश में अति पिछड़ों और अति दलितों को आरक्षण देने पर विचार कर रही है तो वोट बैंक की सियासत में भूचाल आ गया तो इसके सियासी निहितार्थ भी तलाशे जाने लगे। योगी सरकार इसके लिए कमिटी गठित करने जा रही है। सीएम योगी कहते हैं कि जिन्हें अब तक अधिकारों से वंचित किया गया था, हमारी सरकार उन्हें उनका अधिकार और सम्मान दिलवाएगी।

दरअसल, अति पिछड़ों और अति दलितों को आरक्षण का ऐलान कर बीजेपी, सपा और बसपा को उनके ही बनाए चक्रव्यूह में घेरने की तैयारी में है। लोकसभा उप चुनाव में मिली हार के बाद भाजपा को लग रहा है कि यह गठबंधन आगे भी जारी रहा तो मुश्किल हो सकती है। ऐसे में 2019 लोकसभा चुनाव से पहले दलित−ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भाजपा यह नया दांव चला है। अति पिछड़े और अति दलित साथ आ गए तो बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

यूपी में लगभग 19 प्रतिशत अगड़ी आबादी, 46 प्रतिशत ओबीसी, 21 प्रतिशत दलित और 14 प्रतिशत अल्पसंख्यक हैं। माना यह जाता है कि अगड़ी आबादी के वोटर बीजेपी का मजबूत वोट बैंक हैं। लेकिन सिर्फ अगड़ों के सहारे सत्ता हासिल नहीं की जा सकती है, इसलिये बीजेपी पिछड़ा और दलित वोट बैंक में भी सेंधमारी की कोशिश करती रहती है। जिस तरह से अगड़े वोटर बीजेपी की पक्ष में मतदान करते हैं उसी प्रकार पिछड़ा वर्ग और दलित वोटरों का एक बड़ा धड़ा क्रमशः समाजवादी पार्टी और बसपा के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। बीजेपी जानती है कि चाहे बात 2014 के लोकसभा चुनाव की हो या फिर 2017 के विधान सभा चुनाव की, दोनों ही मौकों पर बीजेपी को तभी शानदार जीत मिली जब पिछड़ा और दलित वोटरों का रूझान उसकी तरफ हुआ। पिछले लोकसभा और विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने ओबीसी चेहरों को आगे कर और हिंदुत्व के जरिए विपक्षियों का जातीय गणित बिगाड़ा था, लेकिन गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उप−चुनाव में इन वोटरों के बीजेपी से मुंह मोड़ कर सपा−बसपा के साथ आते ही बीजेपी को दोनों सीटें गंवानी पड़ गईं। इसीलिये अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पूर्व बीजेपी की कोशिश दलितों और ओबीसी में सेंध लगाने की है। 46 प्रतिशत ओबीसी में करीब 27 प्रतिशत आबादी गैर यादवों की है। बीजेपी की कोशिश इसी गैर यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की है ताकि सपा को कमजोर किया जा सके। वहीं दलितों की 21 प्रतिशत आबादी में करीब 55 प्रतिशत आबादी जाटव की है जो मायावती के कोर वोटर हैं। बाकी 45 प्रतिशत अति दलित की श्रेणी में आते हैं जो कभी बसपा का कोर वोटर नहीं माना गया। बीजेपी इसी 45 प्रतिशत अति दलितों को अपने पाले में लाना चाहती है।

उत्तर प्रदेश में कोटे में कोटे की सियासत की जब भी बात होती है तो पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का नाम जरूर लिया जाता है, लेकिन यह खेल इससे भी काफी पुराना है। इसी क्रम में कांग्रेस के शासनकाल में 1976 में डॉ. छेदीलाल साथी आयोग बना था। उसने भी अति पिछड़ों के आरक्षण की वकालत की थी। असल में संविधान के अनुसार अति पिछड़ों को आरक्षण तो संवैधानिक दृष्टि से संभव है, लेकिन इस पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा चुका है। पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी ऐसी कोशिश पर कोर्ट का कहना था कि दलितों में जातियों का वर्गीकरण नहीं हो सकता।

बात 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के प्रयासों की कि जाये तो राजनाथ ने दलितों और पिछड़ों में हर जाति को उसकी संख्या के अनुपात में आरक्षण देने के लिए हुकुम सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। कमेटी की रिपोर्ट को विधान सभा में पारित भी कर दिया गया था, लेकिन उनकी ही सरकार में मंत्री अशोक यादव इसके खिलाफ कोर्ट चले गए थे। कोर्ट ने इस कमेटी की रिपोर्ट पर रोक लगा दी थी।

17 साल के बाद यह मामला तब पुनः गरमाया जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में 22 मार्च 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जरूरत पड़ने पर अति दलितों और अति पिछड़ों को अलग आरक्षण कोटा देने के लिए कमेटी गठित करने की घोषणा करते हुए कहा था कि कमेटी किन−किन मुद्दों पर विचार करेगी, यह तय होना अभी बाकी है। बात 2001 में तत्कालीन सीएम और बीजेपी नेता राजनाथ सिंह के प्रयासों की कि जाये तो तब राजनाथ सिंह द्वारा बनाई गई सामाजिक न्याय सिमिति की रिपोर्ट के आधार पर दलितों का दो श्रेणियां में बांटा गया था। श्रेणी ‘ए’ में जाटव और धूसिया रखे गए थे और श्रेणी ‘बी’ में 65 अन्य दलित बिरादरियां। श्रेणी ‘ए’ में रखी गईं जातियों को 10 प्रतिशत और श्रेणी ‘बी’ की दलित बिरादरियों को 11 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की गयी थी।

इसी क्रम में प्रदेश के पिछड़ा वर्ग को तीन श्रेणियों में बांटा गया था। इनका कुल कोटा 27 प्रतिशत की बजाय 28 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई थी। श्रेणी ‘ए’ में यादव और अहीर रखे गए थे। इस श्रेणी के पिछड़ों को पांच प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत की गयी थी। श्रेणी ‘बी’ में जाट, कुर्मी, लोध व गूजर जैसी आठ पिछड़ी जातियों को रखा गया था और उन्हें नौ प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी। श्रेणी ‘सी’ में 22 मुस्लिम पिछड़ी जातियों को मिलाते हुए कुल 70 अति पिछड़ी बिरादरियों को 14 प्रतिशत आरक्षण कोटा देने की बात कही गयी थी। रिपोर्ट में अनुसूचित जनजातियों यानी आदिवासियों को 0.06 प्रतिशत की बजाय दो प्रतिशत आरक्षण कोटा देने की सिफारिश की गयी थी। यह और बात थी कि सामाजिक न्याय समिति की इस रिपोर्ट को अदालत में चुनौती दी गयी और हाईकोर्ट ने ‘कोटे में कोटा नहीं दिया जा सकता’ के आधार पर इस पर रोक लगा दी थी। इससे पहले हेमवती नंदन बहुगुणा के मुख्यमंत्रित्व काल में डॉ. छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग आयोग बना था। उसने प्रदेश के पिछड़ों को तीन श्रेणियों में बांटते हुए उनके लिए अलग−अलग कोटा तय किया था मगर इस आयोग की सिफारिशें भी तमाम कोशिश के बावजूद लागू नहीं हो पायीं।

लब्बोलुआब यह है कि यूपी एक बार फिर वोट बैंक की सियासत का प्रयोगशाला बनने जा रहा है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की पिछल्लू बनी कांग्रेस जहां पिछड़ों−दलितों और मुलसमानों के सहारे 2019 की वैतरणी पार करना चाहती है, वहीं बीजेपी हिन्दुत्व के नाम पर सभी हिन्दुओं को एक ‘छतरी’ के नीचे ठीक वैसे ही ले आना चाहती है, जिस तरह से 2014 और 2017 में वह लाने का सफल प्रयोग कर चुकी है।

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