Home संपादकीय BALKIS BANO: A non-political story: बिलकिस बानो: एक गैर-राजनीतिक कहानी

BALKIS BANO: A non-political story: बिलकिस बानो: एक गैर-राजनीतिक कहानी

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सिने स्टार अक्षय कुमार द्वारा पीएम नरेन्द्र मोदी का गैर-राजनीतिक इंटरव्यू लेने के बाद पूरे देश में अचानक ‘गैर-राजनीतिक’ शब्द का बोलबाला बढ़ गया है। और तो और साक्षात्कार के दिन देश के एक मशहूर टीवी न्यूज चैनल ने अपने प्राइम टाइम को भी गैर-राजनीतिक बता दिया था। बात भी सही है। देश में चुनाव का मौसम उफान पर है। चारों तरफ राजनीतिक चर्चाएं छिड़ी हुई हैं। हर कोई राजनीति के रंग में डूबा हुआ है। इस स्थिति में सियासत के माहिर खिलाड़ी हमारे पीएम मोदी का गैर-राजनीतिक साक्षात्कार थोड़ा अटपटा लगता है। खैर, वो तो हो ही गया। मैनें भी सोचा कि हर बार की सियासत से अलग इस बार एक गैर-राजनीतिक कहानी सुनाई जाए। इसके लिए विषय बिलकिस बानो को चुना। यदि इस कहानी में आपको राजनीति नजर आ जाए तो इसमें मेरा दोष नहीं। मैं तो गैर-राजनीतिक बताकर लिख रहा हूं। तो शुरू करते हैं। 23 अप्रैल, 2019 का दिन भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। इस दिन तीसरे चरण का मतदान हुआ, जिसमें गुजरात की सीटें भी शामिल थीं। लेकिन खास बात यह रही कि गुजरात के दाहोद जिले में बिलकिस बानो ने वोट डाला, वो भी 17 साल बाद। ऐसा नहीं है कि इन 17 सालों में बिलकिस बानो ने एक मतदाता के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने में कोताही बरती, बल्कि वे तो इस लंबी अवधि में लगातार एक नागरिक और एक महिला के अधिकार और सम्मान की लड़ाई लड़ती रहीं। गोधरा कांड और उसके बाद हुए गुजरात दंगों की बात मीडिया के बड़े तबके में साधारण पन्नों की तरह पलट दी जाती हैं, उन पर चर्चा जरूरी नहीं समझी जाती, क्योंकि इससे बहुत से राजनीतिक और व्यावसायिक हितों को चोट पहुंच सकती है। लेकिन 21वीं सदी के भारत पर लगे इस बदनुमा दाग को मिटाना आसान नहीं है। इन दंगों का शिकार बिलकिस बानो भी थीं। अहमदाबाद के पास रणधी कपूर गांव में दंगाइयों ने 5 माह की गर्भवती बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप किया था और उनकी तीन साल की बेटी सालेहा की भी बेहरमी से हत्या कर दी गई थी।
बिलकिस मामले की सुनवाई की शुरुआत अहमदाबाद में हुई, लेकिन सबूतों और गवाहों से छेड़छाड़ की आशंका जताने पर मामले को साल 2004 में मुंबई हाईकोर्ट को हस्तांतरित कर दिया गया। इससे समझा जा सकता है कि गुजरात में हालात क्या थे और एक अल्पसंख्यक, सांप्रदायिक हिंसा की शिकार महिला को लड़ने में किन तकलीफों से बार-बार गुजरना पड़ा होगा। बहरहाल, 2008 में हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषियों को सजा सुनाई। गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो को 5 लाख का मुआवजा देने का फैसला लिया। यूं तो उनके जख्म किसी मुआवजे से नहीं भर सकते, न ही उनके लिए इंसाफ की कोई कीमत लगाई जा सकती है। लेकिन बिलकिस बानो ने याचिका दायर कर इसे अपर्याप्त बताया। जिसके बाद 23 अप्रैल, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को आदेश दिया कि वह दंगा पीड़ित बिलकिस बानो को 50 लाख रुपए मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास मुहैया कराए। इस निर्देश पर बिलकिस बानो ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका में उनका विश्वास और भी मजबूत हुआ है और यह बलात्कार एवं साम्प्रदायिक हिंसा की अन्य पीड़िताओं के लिए उम्मीद की एक किरण है। शीर्ष न्यायालय ने मेरे दर्द, मेरी पीड़ा और मेरे संघर्ष को समझा, जिसने 2002 की हिंसा में गंवाए गए मेरे संवैधानिक अधिकारियों को वापस दिलाया। उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक को सरकार के हाथों पीड़ा नहीं झेलनी चाहिए, जिसका कर्तव्य हमारी रक्षा करना है। बिलकिस बानो की ये बातें सत्ताधारियों को जरूर सुननी चाहिए। समाज के धन, शक्ति और सत्ता संपन्न लोगों को बिलकिस बानो की वो बातें भी सुननी चाहिए, जो उन्होंने मुआवजा राशि के इस्तेमाल को लेकर कहीं। उन्होंने कहा कि वह इसके एक हिस्से से अपनी पहली संतान सालेहा की याद में एक कोष गठित करेंगी, ताकि यह न्याय पाने के सफर में साम्प्रदायिक हिंसा की शिकार अन्य पीड़िताओं की मदद कर सके। वाकई दाद देनी चाहिए बिलकिस बानो की, जिन्होंने सारी ताकत जुटाकर लड़ने का हौसला दिखाया। इस लड़ाई में उनके साथ उनके पति तो खड़े ही रहे, बहुत से लोग ऐसे भी थे, जिनका उनसे सीधे तौर पर कोई वास्ता नहीं था, लेकिन इंसानियत के रिश्ते को निभाने और बचाने के लिए उन्होंने शक्तिशाली लोगों के खिलाफ खड़े रहने की हिम्मत दिखाई।
अब सवाल यह उठता है कि बिलकिस बानो को किसने सत्रह सालों तक उसके मताधिकार से वंचित रखा? कौन था गुजरात का मुखिया और किसके हाथ हिंदुस्तान की हुकूमत थी? क्यों वर्षों बिलकिस अपने कुनबे के साथ भटकती रही पूरे भारत, जगह बदलती हुई, पोशीदा ज़िंदगी बिताती हुई? क्यों वह वहां महफूज न थी, जिसे वह अपना वतन कहती है? 23 अप्रैल को मतदान के बाद बिलकिस बानो का चित्र दिखा। बुर्के में, चेहरा खुला और आंखें कैमरे को सीधे देखती हुईं, और एक उंगली उठी हुई जिस पर एक निशान है जो मिटता नहीं। वह निशान जो हिंदुस्तान का हर शहरी एक तमगे की तरह पहनता है एक रोज़ पांच साल में। वह इसका सबूत है कि वह उन करोड़ों में एक है जिसमें ताकत है अपने देश के वतर्मान और भविष्य का रास्ता तय करने की। वह भारत की एक मतदाता है, भारत के संविधान के पहले पन्ने पर लिखे इन शब्दों का हिस्सा हम भारत के लोग। बिलकिस बानो अकेली नहीं है। उसके साथ उसका शौहर याकूब है और चार साल की बच्ची है। हिंदुस्तान की राजधानी से कोई 900 किलोमीटर दूर गुजरात के दाहोद जिले के देवगढ़ बारिया के मतदान केंद्र के बाहर यह जो औरत खड़ी थी, वह सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि हम सबके लिए। वह सिर्फ अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर रही, हमें बता रही है कि हिंदुस्तानीयत यों ही नहीं मिल जाती। उसे हासिल करना पड़ता है। खून और पसीने की कीमत के साथ। आज वह अपने चार बच्चों और शौहर के साथ एक कमरे की पनाहगाह में है। बिलकिस का किस्सा हर हिंदुस्तानी को सुनना और उसके मायने समझना जरूरी है और 23 अप्रैल की अहमियत को भी दर्ज करना जरूरी है।
कानून ने 2002 की 3 मार्च को बिलकिस के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के लिए गुजरात सरकार की जवाबदेही तय की है। उसे बिलकिस बानो को 50 लाख रुपए, एक नौकरी और उसकी पसंद की रहने की जगह देने का आदेश दिया है। बिलकिस सबसे बड़ी अदालत के पास दोबारा आई थी। उसने गुजरात सरकार के पांच लाख के मुआवजे को ठुकरा दिया और अदालत से कहा कि उसके साथ जो अन्याय हुआ है, यह मुआवजा उसकी गंभीरता के लिहाज से तुच्छ है। अदालत ने उसकी बात समझी, इसकी हमें तसल्ली होनी चाहिए। बिलकिस का किस्सा आंसू लाने को और आपकी दया उपजाने के लिए नहीं बल्कि उसके धीरज, जीवट और संघर्ष को समझने के लिए जानना जरूरी है, जिसके बिना नागरिकता का अधिकार रखा नहीं जा सकता। इस लंबे संघर्ष में बिलकिस अकेली न थी। उस आदिवासी स्त्री और उसके परिवार को याद कीजिए जिसने बिलकिस को कपड़े दिए, उसे पनाह दी और जो उसके साथ हुए अत्याचार की गवाह के तौर पर टिकी रही। गुजरात में खासकर ऐसे मामलों में गवाही पर टिके रहना कोई मामूली बात नहीं। कातिलों से भागती बिलकिस को अहमदाबाद, बड़ोदा, मुंबई, लखनऊ, दिल्ली में जिन्होंने अपने साथ रखा, उन्हें भी याद कीजिए। उन्हें, जिन्होंने बिलकिस के इंसाफ के लिए लड़ने के हौसले को जिंदा रखा, उसका हाथ थामा और बार-बार खूनियों की निगाह के सामने से उसे अदालत की दहलीज पार करने में मदद की। यह जरूर याद रखिए कि न उनका उससे खून का रिश्ता था, न जात का और न जो उसके हम-मजहब ही थे। वे लेकिन खुद को उसकी हम-शहरी मानते थे। उन्होंने इंसाफ की इस जद्दोजहद में सिर्फ बिलकीस को अपनी नागरिकता बरकरार रखने में सहायता न दी, अपनी नागरिकता साबित की और उसका हक अदा किया। बहरहाल, यह बताना चाहता हूं कि बिलकिस बानो के रूप में एक गैर-राजनीतिक कहानी लिखने की कोशिश की है। लेकिन आप जानते हैं कि भारत में हर बात पर राजनीति की छाप दिखने लगती है। सो, मैं नहीं कहता कि बिलकिस की इस कहानी में आपको राजनीति नहीं दिखेगी। ठीक उसी तरह जैसे गैर-राजनीतिक होते हुए भी पीएम मोदी का साक्षात्कार पूर्णतया राजनीतिक था।

राजीव रंजन तिवारी

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