Modi’s victory demolished the chatrap’s delusion: मोदी की जीत ने ध्वस्त किया क्षत्रपों का मायाजाल

17वीं लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी दोबारा बड़ी ताकत के साथ जीते हैं। एनडीए के सभी 39 दलों ने उन्हें बगैर किसी हिचक के अपना नेता चुन लिया है। उनकी भारी जीत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कुशल प्रबंधन के साथ ही मोदी की नीतियों की स्वीकार्यता के कारण मिली है। देश के मतदाताओं ने मोदी पर भरोसा जताया है। उन पर 2014 में भी मतदाताओं ने भरोसा जताया था और जनता ने अपने रिपोर्ट कार्ड में उन्हें 303 अंकों से पास किया है। कई राज्यों में विरोधी दलों को खाता खोलने तक का विश्वास नहीं मिल सका। इतने भारी जनादेश से जनता की उम्मीदें भी भारी हैं। मोदी ने नेता चुने जाने के बाद स्पष्ट किया कि घर के पूजाघर में चाहे जो पूजिए मगर देश में भारत माता सबसे बड़ी देवी हैं। उनकी इस बात में दम भी है क्योंकि उनको जीत भाजपा के राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक रूख के कारण ही मिली है। सैन्य सम्मान के नाम पर जिस तरह से उन्होंने सेना को चुनावी मुद्दा बनाया, उसके लिए भी जनमत मिला है। ऐसे में उनका वैश्विक संबंधों को लेकर स्पष्ट रूख सकारात्मक है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भले ही जनता और युवाओं से जुड़े मुद्दे उठाए मगर जनता ने उसे तरजीह नहीं दी। वह राष्ट्रवाद की कहानी पर ही मुहर लगाती रही। कांग्रेस में जो सबसे बड़ी कमी देखने को मिली वह उसमें नेताओं की भीड़ दिखी मगर कार्यकर्ताओं का टोटा था। कई जगह तो बूथ संभालने वाले भी नहीं थे। राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका के साथ देशभर में जूझते रहे मगर उसका प्रभाव उतना नहीं छोड़ सके जो चाहते थे। इस दौरान मोदी के अंडरकरेंट से जो सबसे बड़ा काम हुआ, वह राज्यों के क्षत्रपों का सफाया है। कांग्रेस के 9 पूर्व मुख्यमंत्री और कई पूर्व केंद्रीय मंत्री जो खुद को अपने इलाकों राज्यों का ठेकेदार समझते थे, बोरिया बिस्तर समेटते नजर आए। कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में 44 से 52 सीटों पर पहुंच गई, हालांकि यूपी में वह अपनी अमेठी सीट भी हार गए। मोदी इतने बड़े कद के साथ खड़े हुए हैं कि बिहार में खुद को जननेता समझने वाले नितिश कुमार सूबेदार की तरह खड़े थे तो महाराष्ट्र में शिवसेना के रथ पर सवार उद्धव ठाकरे मोदी प्रार्थना में शामिल दिखे। यही हालत अन्य तीन दर्जन दलों की भी रही।
सर्वविदित है कि क्षत्रपों ने देश को जाति-धर्म और क्षेत्रवाद की सियासत करके देश को बांट रखा है। इसी सियासत के बूते सपा-बसपा और रालोद मिलकर यूपी जीतने निकले थे। उनका अहम इतना अधिक था कि उन्होंने राष्ट्रीय दल कांग्रेस को अपने गठबंधन में जगह तक नहीं दी। बंगाल में ममता दहाड़ रही थीं तो नागालैंड और कश्मीर में अलगाववादियों का शोर था। मोदी के अंडरकरेंट ने इन सब को उनकी औकात दिखा दी है। इनके लिए अपने कुनबे को बचाना भी मुश्किल हो गया। इससे देश और भाजपा को जो फायदा हुआ, वह तो दिखता है मगर दूसरा फायदा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी हुआ है। कांग्रेस को राज्यों में बुरी गति तक पहुंचाने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों की वह जमात जो राहुल पर गुरार्ती थी, अब सदमे में है। कांग्रेस ने जो 52 सीटें जीती हैं, उनमें 48 राहुल टीम के सदस्य हैं। ऐसे में उनके लिए भविष्य की राजनीति आसान हो गई है, हालांकि उन्हें मजबूत होने के लिए कड़ी मेहनत और रणनीति के साथ ही संसाधनों की जरूरत है। कांग्रेस और उसके नेताओं ने सदैव खुद को बनाने की राजनीति की है जबकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा नेताओं ने मोदी और पार्टी को समृद्ध किया है। राहुल को भी उसी तरह की फौज तैयार करनी होगी।
इस बार जीत भाजपा की नहीं बल्कि मोदी की है। इसका प्रमाण दो दर्जन ऐसे लोग हैं जो सांसद बने हैं। उनका सियासी रिश्ता महीने भर का भी नहीं है। अकूत धनबल से चले चुनाव अभियान में पांच साल पहले किए गए अच्छे दिनों के वादे को पीछे छोड़ दिया गया। उसकी जगह हिंदुओं के दिमाग में मुसलमानों को लेकर भय पैदा करने और मोदी को आतंकवाद को खत्म करने वाले एकमात्र नेता के तौर पर पेश किया गया। मोदी ने पुलवामा के आत्मघाती हमले में शहीद हुए अर्धसैनिक बलों के जवानों का इस्तेमाल चुनावी हथियार के तौर पर खुलेआम किया। उनके नाम पर वोट मांगने से भी वह नहीं चूके। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के पास इस राष्ट्रवादी रणनीति का कोई तोड़ नहीं था। आपने भारतीय सेना को मोदी सेना के तौर पर प्रस्तुत किया। चुनाव आयोग ने भी इस प्रचार अभियान की तरफ देखना मुनासिब नहीं समझा। उसने मोदी के मामले में तुलसीदास की चौपाई ‘मीचऊ आंख कतऊं कछु नाहीं’ को अपना लिया। विरोधी दल चिल्लाते रह गए मगर चुनाव आयोग ने चुप्पी साधे रखी। बहराल, सबसे बड़ी जनता होती है और उस जनता जनार्दन ने मोदी की हर गलती को भी सराहा, नतीजतन वह दोबारा प्रधानमंत्री की शपथ लेने जा रहे हैं।
मोदी ने जीत के बाद अपने पहले संबोधन में स्पष्ट किया कि वह सकारात्मक राजनीति की दिशा में बढ़ रहे हैं। भले ही 2014 में उन्हें जनता न जानती हो मगर वह जनता के दर्द को समझते थे। उस पर काम किया और अब दोनों एक दूसरे को जानते हैं। जनता ने जो विश्वास जताया है, उसको पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है। मोदी ने सही कहा, उनकी जिम्मेदारी जीत के आंकड़े के साथ ही बढ़ गई है। यह समझना होगा कि दो कारण होते हैं किसी के प्रति खड़े होने के, पहला डर और दूसरा लालच। इस बार दोनों ही शामिल थे। पहला, मोदी के नाम का डर तमाम लोगों के भीतर बैठा हुआ था तो दूसरी ओर उस जनता के भीतर लालच था, जो उनसे संतुष्टि पाने को खड़ी थी। नफरत और झूठ की भी इस चुनाव में बड़ा अहम भूमिका थी। किसी को किसी खास संप्रदाय से नफरत है तो किसी को किसी जाति वर्ग से। इसका तुष्टीकरण मोदी के नाम को आगे बढ़ाने से हो रहा था। दूसरी तरफ राहुल गांधी के नेतृत्व में एक बार फिर से कांग्रेस पर यकीन बढ़ा है। उसका वोट शेयर और सीटें बढ़ी हैं मगर उनकी औकात सीमित कर दी गई है। कांग्रेस अपने गढ़ भी नहीं बचा सकी। कांग्रेस अपने से टूटे नेताओं को भी यकीन नहीं दिला सकी। उसके नेता पांच साल सत्ताविहीन रहने के बाद भी घमंड में चूर नजर आए। उन्होंने अतीत से सीखने की जरूरत नहीं समझी। इंदिरा गांधी ने 1977 की हार के बाद सरल होना सीख लिया था। पीएम रहते वह जब कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी के पास मिलने पहुंचीं, तो वह पूजा कर रहे थे। उनकी बहूजी ने कहा अभी डेढ़ घंटा लगेगा। इंदिरा गांधी ने वहीं बैठकर उनका इंतजार किया।
नरेंद्र मोदी ने भी शुक्रवार को जीत के दंभ को भूलकर भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी के घर जाकर चरण वंदन किया। इसके भले ही कोई भी सियासी मायने निकाले जाएं मगर कांग्रेस को भी यह सीखने की जरूरत है। उसे उस जनता के पास जाना होगा जो उनकी मार्गदर्शक और जनार्दन है। उसके भीतर विश्वास जगाना होगा। मोदी ने जिन क्षत्रपों को खत्म किया है, उनसे किनारा करके खुद को जननेता बनाने की दिशा में काम करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक इस सकारात्मक जनादेश का फायदा जनता को नहीं मिल पाएगा। यह अच्छा अवसर मिला है भाजपा को कि वह उन सभी वादों को पूरा करे जो उसने किए थे और कांग्रेस जनता के बीच जाकर उनकी बात शुरू करे। अपने दल के संगठन को जमीनी स्तर पर तैयार करें। सशक्त ढांचा तैयार करें।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Positive Mandate: सकारात्मक जनादेश

देश में 17वीं लोकसभा के गठन के लिए जनादेश आ चुका है। नागरिकों ने एक बार फिर से भाजपा की मोदी सरकार पर भरोसा जताया है। सितंबर 2013 में जब भाजपा की नाव डगमगा रही थी तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा था। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जब उन्हें प्रस्तुत किया था तब भाजपा के कुछ वरिष्ठ रूढिवादी नेताओं ने विरोध किया था। मोदी के चेहरे पर 2014 में पहली बार किसी गैर कांग्रेसी सरकार ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी। अच्छे दिनों के वायदे के साथ आई मोदी सरकार ने तमाम उम्मीदों पर काम किया। उन्होंने जो सबसे बड़ा काम किया वह राष्ट्रवाद और सैन्य सम्मान के जरिए एक मजबूत दिखने वाली छवि बनाने पर रही। उन्होंने साफ सफाई से लेकर सुरक्षा तक की बात की। इसका नतीजा यह रहा कि 2019 के चुनाव में वह अच्छे दिनों के वादे लेकर नहीं गये बल्कि अबकी बार फिर मोदी सरकार, के नारे के साथ जनता के बीच गये।
गुरुवार को लंबे लोकतांत्रिक पर्व का जब परिणाम आया तो अबकी बार और मजबूत मोदी सरकार का नारा जनता ने दे दिया। चुनाव के दौरान मोदी पर कई तरह के आरोप भी लगे और स्तरहीन चुनाव बनाने का लांछन भी। जनता ने सभी लांछनों और आरोपों को दरकिनार करके मोदी को मजबूत किया, क्योंकि उसे एक मजबूत सरकार की दरकार थी। मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस न तो मोदी की रणनीति को समझ सकी और न ही उसके नेता खुद को उस स्तर तक ला पाये कि वो मुकाबला कर सकते। हालांकि पिछली दफा से अच्छा जनादेश लेकर आये मगर विपक्ष में ही बैठने का। पांच साल विपक्ष में रहने के दौरान भी कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपना काडर नहीं खड़ा कर पाई। वह सिर्फ नकारात्मक प्रचार में ही लगी रही। वह भूल गई कि इसी नकारात्मक प्रचार ने मोदी को देश का हीरो बनाया था। कांग्रेस के पास न तो उस स्तर का संगठन रहा और न ही चिंतक। बूथ स्तर के कार्यकतार्ओं का भी अभाव था।
बहराल, जनता ने मोदी पर भरोसा जताया है। मोदी के सामने भी चुनौती है कि वह कैसे 130 करोड़ के देश के लोगों को एक सुरक्षित जीवन देने के लिए क्या करेंगे। जरूरत युवाओं को रोजगार की भी है। व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की भी दरकार है। जनादेश इतना सकारात्मक है कि मोदी जो चाहें कर सकते हैं, बस अब उन्हें मन की बातों के बजाय लोगों की जरूरतों को पूरा करने पर काम करना होगा। करदाताओं को सामाजिक सुरक्षा का अहसास कराना होगा। राष्ट्र को वास्तव में सुरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Sponsored hatred game for vote politics: वोट की सियासत के लिए प्रायोजित नफरत का खेल

 श्रीरामकृष्ण परमहंस जी ने अपना पूरा जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह किसी धर्म संप्रदाय या व्यक्ति के नहीं देवी काली के भक्त थे। उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित हकीकत थी। काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं और उन्हें आनंदविभोर छोड़ जाती थीं। यह वास्तव में होता था। उन्हें कोई मतिभ्रम नहीं था। वह पढ़े लिखे नहीं थे मगर उनसे ज्ञान लेने कोलकाता के बड़े-बड़े विद्वान आते थे। विवेकानंद भी आये और चंद सालों में वह विश्वस्तर पर पहचान बना सके। परमहंस जी की आलोचना उनके सामने ही सिर्फ ईश्वर चंद बंदोपाध्याय कर पाते थे, जब कोई उनसे कहता कि ईश्वर चंद ऐसा कहते हैं तो वह कहते थे कि ईश्वर चंद ‘विद्यासागर’ है। ज्ञानी है, उसके ज्ञान का सम्मान करो। विद्यासागर जो कर सकता है वह कोई अन्य नहीं कर सकता। उन्हीं विद्यासागर की प्रतिमा को उन्मादी भाजपा कार्यकर्ताओं ने साजिश के तहत राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान तोड़ दिया।

उन्होंने यह हमला नफरत का ध्रुवीकरण कर वोट बैंक बनाने के लिए किया था मगर घटना के वीडियो सामने आने से साजिश बेनकाब हो गई।बंगाल के नवजागरण के अगुआ समाज सुधारक विद्यासागर जी को बंगाल के नागरिक देवता की तरह मानते हैं। जिनको बंगाल के सबसे बड़े संत रामकृष्ण परमहंस जी ने भी सम्मान दिया हो, जब उनका अपमान होगा तो बंगाली कभी चुप नहीं बैठ सकता। धर्म के ठेकेदार बने भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनकी मूर्ति तोड़कर समाज को तोड़ने का काम किया। यह नफरत पैदा करने वाली थी, जो हिंसा में बदली। इस घटना की निंदा के बजाय भाजपा नेताओं ने इसे सियासी रूप देकर वोट बटोरने की असफल कोशिश की। इसी तरह भाजपा ने आतंकी हमले के मामले में आरोपित प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा का प्रत्याशी बनाकर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम किया।

प्रज्ञा के खिलाफ अदालत में आरोप तय हो जाने के बाद भी बीमारी का बहाना करके इलाज के नाम पर जमानत ली गई। इलाज हो रहा है या नहीं मगर वह चुनाव जरूर लड़ रही है। उसने अपने आचरण के अनुकूल भारत देश के निर्माता महात्मा गांधी के हत्यारे का महिमा मंडन करते हुए उसे देशभक्त और पुरुषार्थी बताया। अगर 79 वर्ष के गांधी की हत्या करना पुरुषार्थ है, तो उससे घिनौना नहीं हो सकता है। यह पहली बार नहीं हुआ। इस आतंकी महिला ने पहले भी कई बार नफरत फैलाने वाला जहर उगला है। इसके बावजूद भाजपा ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया। जब भाजपा का राष्टÑीय अध्यक्ष अमित शाह महात्मा गांधी को चतुर बनिया कहता है तो फिर उससे ऐसे शब्दों के प्रयोग को रोकने की उम्मीद बेमानी है। बंगाल को मिनी पाकिस्तान बताने वाली भाजपा के नेताओं ने चुनाव के दौरान केरल में भी ऐसे ही बवाल खड़े किये थे। इस तरह की घटनायें करके कट्टरवादी भावनाओं को भुनाने की कोशिश होती रही है।

प्रज्ञा सिंह ही नहीं सांसद सच्चिदानंद साक्षी और निरंजन ज्योति से लेकर अजय सिंह बिष्ट (योगी आदित्यनाथ), तक ने कट्टरपंथ के जरिए समाज में जहर बोया है। जिनके कारण कई बार सांप्रदायिक हिंसा भी हुई है। यही करके ये लोग वोट बैंक बनाते हैं। लोकतंत्र की भावनाओं के विपरीत इस तरह की हरकतें करने वालों को हतोत्साहित करने के बजाय विश्व के सबसे बड़े सियासी दल होने का दम भरने वाली पार्टी उन्हें प्रोत्साहित करती है। देश के प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रियों और सांसदों से उम्मीद की जाती है कि वे नैतिक रास्ते अपनाएंगे मगर वे सिर्फ ढकोसले के लिए ऐसा करते हैं। उसका कोई मायने नहीं रखता। उदाहरण गोहत्या के नाम पर होने वाली भीड़ के हमले रहे हैं।

पीएम मोदी ने दिखावे के लिए बोला मगर किया कुछ नहीं, क्योंकि यह वोट बैंक बना रहा था।हमें याद है कि जब अलीगढ़ और मेरठ नगर निगम में मेयर ने वंदेमातरम स्वैच्छिक करने का आदेश दिया तो भाजपा के लोगों ने तोड़फोड़ से लेकर हमले तक किये थे, मगर जब प्रधानमंत्री के मंच पर ही बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार और जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उठना भी जरूरी नहीं समझा तो मोदी ने उनके साथ रहते वंदे मातरम कहना ही बंद कर दिया। स्पष्ट है कि यह सिर्फ वोटबैंक के लिए पढ़ा जाता है। नफरत पैदा करके कुछ भी मनगढ़ंत बोलने की परंपरा हो गई है। जैसे एक रैली में मोदी ने कहा कि कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें गंदी नाली का कीड़ा, गंगू तेली, पागल कुत्ता, रेबीजयुक्त बंदर सहित तमाम गालियां दीं। प्रधानमंत्री जैसे ओहदे पर बैठा व्यक्ति अगर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करता है तो निश्चित रूप से दुखद स्थिति उत्पन्न करने वाला है। ऐसे शब्द और नफरत की भाषा सिर्फ सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल हो रही है।

यह किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। पहले झूठ बोला जाता था मगर अब झूठी कहानियां और इतिहास सुनाकर नफरत को फैलाया जा रहा है।सबसे अधिक दुख तब होता है, जब चुनावी फायदे के लिए ऐसे गंदे शब्दों और नफरत के बीज बोने का काम डंके की चोट पर होता है। सुव्यवस्था और निष्पक्षता के लिए जिम्मेदार चुनाव आयोग खामोश रहता है। चुनाव आयोग ने एक पार्टी एजेंट की तरह काम किया। उसने व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने पर जोर नहीं दिया बल्कि विरोधी दल के नेताओं को भाजपा को फायदा दिलाने के लिए कुचलने का काम किया। दुख तब और हुआ जब चुनाव आयोग ने खराब कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए संविधान में प्रदत्त विशेष शक्ति का इस्तेमाल करके वक्त से पहले चुनाव प्रचार रोकने का आदेश दिया मगर उस वक्त तक प्रचार करने की छूट दी जब तक पीएम मोदी की रैली न संपन्न हो जाये।

पीएम बनने के बाद पहली बार प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए मोदी ने खुद सिर्फ मन की बात की और पत्रकारों के सवालों पर मौन साधे रखा। उन्होंने मन की बात में जो बोला वह देश का दुर्भाग्य है कि उनके पीएम बनने के वक्त सट्टा लगा था जिसमें सट्टेबाजों को भारी नुकसान हुआ था। मोदी यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा सके कि सट्टा कानूनन अपराध है और उन पर उन्होंने क्या कार्रवाई की? उन्होंने यह खुलासा भी किया कि उनका हर स्टेप, एक्शन और रैली की योजना नतीजों को सोचकर बहुत पहले ही कर ली जाती है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नफरत के बीज भी उसमें शामिल होते होंगे। लोकतंत्र का ऐसा विद्रुप चेहरा भी देखना पड़ेगा? यह हमने कभी नहीं सोचा था। क्या लोकतंत्र पर गर्व करके हम गलत साबित होंगे! हम जिस लोकतंत्र पर गर्व करते थे, वह तो ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ वाला था। आज लोकतंत्र नफरत और हिंसा फैलाने वाला बन गया है। अभी भी वक्त है हम सोचें, चिंतन करें। नेता और दल तो अपने फायदे के लिए कुछ भी करने की कोशिश करेंगे ही। दोष उन नेताओं और दलों से अधिक हमारा है कि हम उन्हें चुनकर भेज रहे हैं। हमारा जनसमर्थन ही उनकी ताकत है। अगर हम ऐसे नेताओं और दलों को लज्जित करना शुरू कर दें, तो शायद फिर से लोकतंत्र पर गर्व किया जा सके। हमारी भावी पीढ़ी नफरत और भय में नहीं बल्कि मस्ती में जियेगी। तो फिर जागिये, उठिये और रोक दीजिए नफरत की हवाओं को, एक नई उम्मीद के साथ।

जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Election of politics of hatred, lies and split: नफरत, झूठ और बंटवारे की सियासत का चुनाव

पत्नी से किसी बात को लेकर हमारी बहस हो गई। हमने गुस्से में कुछ ऐसे शब्द बोले जो मर्यादा के विपरीत थे। हमारी बेटियां यह वाकया देख रही थीं। दोनों सहमी सी अपने मां-बाप के बीच होती नोक झोंक पर स्तब्ध थीं। बड़ी बेटी ने हमसे कहा कि पापा आप बड़े हो चुप हो जाओ। हमने गुस्से में उसको थप्पड़ जड़ दिया। छोटी बेटी की ओर देखा तो वह सहमी सी खड़ी थी, उसके मुंह से बोल नहीं निकले मगर चेहरा उसकी मनोदशा बयां कर रहा था। बड़ी बेटी बेचारी सी बनकर दूसरे कमरे में चली गई। उसने एक कागज के टुकड़े पर कुछ लिखा और आंखों में आंसू लेकर बैठ गई। हमने अपना लैपटाप उठाया और दफ्तर के लिए निकलने लगे। बेटी ने वह कागज का टुकड़ा हमें पकड़ा दिया, बोली आफिस जाकर पढ़ियेगा। हम उसे डांटते हुए चले गये और कागज का टुकड़ा नीचे गिर गया। रात जब हम घर आये तो कागज का वह टुकड़ा वहीं पड़ा था। हमने उसे पढ़ा तो शर्मसार हो गया। आत्मग्लानि हुई। उसने लिखा था, पापा हम दोनों आपके बच्चे हैं। आपसे सीखते हैं क्योंकि हमारे आदर्श आप हो। अगर आप ही ऐसा बोलेंगे-करेंगे तो हम क्या बनेंगे? हमने सोचा कि गलती हुई है। गलती चाहे जिसकी हो हमें सुधार करना चाहिए। बेटी को जगाया और उससे कान पकड़कर माफी मांगी। बोली आप सॉरी न बोलिये, आपका प्यार ही काफी है। हम दोनों गले लगे तो आंखें भर आईं।
देश में 17वीं लोकसभा के गठन के लिए निर्वाचन प्रक्रिया चल रही है। यह चुनाव देश के इतिहास में कई कारणों से अहम हो गया है। इस चुनाव में चर्चा कभी किसी के प्रति नफरत फैलाने की होती है, तो कभी कोरा झूठ बोला जाता है। समाज को बांटने वाले उत्तेजक भाषण दिये जाते हैं, जैसे चुनाव के बाद देश में किसी को रहना ही नहीं है। देश के हर नागरिक में एक दूसरे के प्रति प्रेम हो और विश्वास हो, इस पर कोई बात नहीं कर रहा। जनता के बीच जा रहे सियासी नेताओं के भाषणों से मुद्दे गायब हैं। लोग रामराज की अपेक्षा करते हैं मगर उसका व्यवहार किसी राक्षसी युग के प्राणी जैसा होता है। सत्ता पाने की चाहत में गिरने की हालत यह है कि निचले से निचले स्तर पर उतरने की होड़ सी मची है। वे लोग जिनसे उम्मीद की जाती है कि आदर्श स्थापित करेंगे, चाहे शब्दों में हो या फिर व्यवहार में, वही लोग सबसे ज्यादा मर्यादायें तोड़ रहे हैं। नतीजतन उनके समर्थक और अनुयायी तो मर्यादा शब्द ही भूल गये हैं। यह चुनाव देश का भविष्य तय करने वाला है मगर ऐसा भविष्य जो नफरत, झूठ और बंटवारे को लोगों के दिलों में भरने वाला है। इस दुखद स्थिति पर खुलकर बोलने की हिम्मत भी देश के जिम्मेदार लोग नहीं कर पा रहे। वेद में वर्णित है.. ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय।’ अर्थात आप मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलें। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें। यह श्लोक ईश्वर, गुरु और शासक से प्रार्थना के लिए बना है। हम धार्मिक रूप से समाज को बांटने की बात करते हैं मगर उन धर्मों में दिये गये संदेश को स्वयं नहीं अपनाते। हमारा धर्म शासक के व्यवहार को भी परिभाषित करता है। शासक राजकीय कार्य संचालन के बीच जीवन में कटुता न आने दें। दूसरे के साथ प्रेम का व्यवहार न छोड़ें। प्रिय भाषण करे। शूरवीर हो मगर बढ़ चढ़कर बातें न करे। जब हमारा धर्म इतने बेहतर तरीके से सत्ता शासक को उसके व्यवहार के बारे में बताता है, तब भी वह उसी धर्म की दुहाई देकर नफरत का माहौल बनाते हैं। वह ऐसे शब्दों और संज्ञाओं का प्रयोग करते हैं, जैसे वह क्रूरतम और घृणित हों। यह कौन सा भारत बनाने के संस्कार निर्मित किये जा रहे हैं। बड़प्पन दिखाने के बजाय छोटापन दिखाने की होड़ में हम देश को कहां ले जा रहे हैं। यह दुखद स्थिति इस वक्त देश में मौजूद है। अपने प्रतिद्वंदी को निकृष्ट साबित करने के लिए स्वांग रचे जा रहे हैं। इनको देखकर तो नहीं लगता कि हम विश्व गुरु बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए उस शब्दावली का प्रयोग किया जो किसी भी काल दशा में निंदनीय है, जबकि मोदी जानते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत तक उनको पाक साफ मान चुकी है। जहां मोदी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे, वहीं प्रतिलंदी राहुल गांधी ने उम्र में छोटे होते हुए भी मोदी को प्यार और झप्पी के साथ कुछ भी कहने की छूट देकर अपना कद बड़ा कर लिया। यह सकारात्मक राजनीति थी। इसके बाद हद तब हो गई जब मोदी ने एक सभा में कहा कि उन्हें विरोधी दल के नेता गंदी नाली का कीड़ा, गंगू तेली, पागल कुत्ता, रेबीज ग्रस्त बंदर, चूहा, सांप, बिच्छू सहित न जाने क्या क्या कहते हैं। वैसे हमने तो किसी जिम्मेदार नेता के मुंह से प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस तरह के शब्द नहीं सुने मगर फिर भी कहते हैं कि अगर किसी ने ऐसे शब्द प्रयोग किये तो यह न केवल दुखद है बल्कि निंदनीय भी। हमने पीएम मोदी के एक भाषण में यह जरूर सुना कि 50 लाख की गर्ल फ्रैंड। हमने उनके मुंह से नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक जो अब इस दुनिया में नहीं हैं के लिए गंदे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग जरूर सुना है। यही नहीं मोदी के मुंह से स्वर्गीय राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस की विधवा पेंशन खा गई जैसे शब्दों को सुना है। हमने उनके भाषण में समाज को तोड़ने वाली भाषा भी सुनी है। चुनाव आयोग ने ऐसे शब्दों पर लगाम लगाने का कोई प्रयास नहीं किया। जो खुद को बड़ा और जिम्मेदार महसूस करते हैं, उनके लिए यह बेहद जरूरी है कि वे शब्दों का मोल समझें। ऐसे लोगों का व्यवहार और शब्दावली आदर्शपूर्ण होनी चाहिए। समाज को जोड़ने की उनकी जिम्मेदारी ऐसे ही बड़े लोगों की होती है। अगर प्रधानमंत्री जैसे सबसे बड़े पद पर बैठा व्यक्ति अपनी मर्यादा नहीं समझेगा तो फिर देश का भविष्य क्या होगा? अनुमान लगाया जा सकता है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों के नेताओं के कर्तव्य तय हैं। दोनों को अपने कर्तव्यों का निर्वाहन और राजनीति करते वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई ऐसा व्यवहार न हो, जिससे समाज में नफरत पैदा हो। किसी भी पूर्व और मौजूदा नेता की आलोचना करते वक्त मर्यादापूर्ण और तथ्यों पर बात होनी चाहिए। झूठ बोलकर समाज और देश को भ्रमित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। आज भी सच्चाई और ईमानदारी की सियासत करने वालों को भारत के नागरिक खुशी से सत्ता सौंपने को तैयार रहते हैं। 2014 में मोदी को देश के नागरिकों ने उन्हें सच्चा और ईमानदार समझकर ही पूर्ण बहुमत दिया था मगर कुर्सी मिलने के बाद उनका व्यवहार क्या रहा? उसकी समीक्षा की जाती है तब दुख होता है कि उन्होंने जनभावनाओं के विपरीत व्यवहार किया। न भाषा का स्तर रहा और न व्यवहार। हम उम्मीद करते हैं कि हमारे नेता आत्ममंथन करके खुद को बड़ा साबित करने की होड़ करेंगे न कि स्तर गिराने की।
जय हिंद।
अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )

Elections are not to make country and society poisonous: चुनाव देश और समाज को विषाक्त बनाने के लिए नहीं

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व ‘17वीं लोकसभा के लिए निर्वाचन’ हो रहा है। यह एक संवैधानिक सृजन और आमजन के हाथों को मजबूत करने का पर्व है। निश्चित रूप से इस पर्व में वह जनता ‘जो वास्तव में अधिकारविहीन है’, अपने एक मत के जरिए भाग्य विधाता बनती है। उसे तय करना है कि उसके हितों को साधने के लिए उस पर कौन शासन करेगा? सच तो यह है कि जनता भले ही किसी दल या व्यक्ति की भाग्य विधाता समझे मगर सच तो यह है कि वह अपना भाग्यविधाता चुनती है। जनता का एक गलत फैसला उसे और उसके आगे आने वाली पीढ़ी को गर्त में डाल देता है। जब हमें यह शक्ति मिलती है कि हम अपना शासक खुद चुनें तो हमें सावधानी के साथ उसको चुनना चाहिए, जो देश और समाज को जोड़ने का काम करे, न कि उसको तोड़ने का। सत्ता हासिल करने के लिए कुछ लोग और राजनीतिक दल समाज-देश को बांटने की सियासत करके माहौल विषक्त बना रहे हैं। रचनात्मकता और सृजन के अवसर पर यह करना देश के साथ गद्दारी है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 75(1) के तहत राष्टÑपति अपने कार्यपालिका के दायित्वों का निर्वाहन करने के लिए एक मंत्रीपरिषद का गठन करता है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री राष्टÑ के उन सभी दायित्वों के निभाने की शपथ लेता है जो संविधान में उसके लिए वर्णित हैं। वह बगैर किसी राग लेष के जिम्मेदारियों को निभाने के लिए बाध्य है। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन सभी संवैधानिक शपथों का उल्लंघन किया है, जो उन्होंने ईश्वर के नाम पर ली थीं। वह बात तो राष्टÑवाद की करते हैं मगर हर तरह के भेदभाव में यकीन रखते हैं। वह कभी धार्मिक आधार पर माहौल विषक्त बनाते हैं तो कभी जातिगत आधार पर। यही नहीं वह क्षेत्रवाद से लेकर तमाम तरह के वाद की बात करते हैं। देश में सबसे अधिक सुरक्षा में रहने के बावजूद वह यह तक कहने से गुरेज नहीं करते कि उनकी जान को खतरा है। यही नहीं, वह सियासी फायदे के लिए विपक्षी दलों को पाकिस्तान पोषित बता देते हैं। सत्ता हासिल करने के लिए वह सैन्य बलों के साहस और कर्तव्यों का श्रेय खुद लेते नजर आते हैं। भारत में ही नहीं विश्व में ऐसा पहली बार हो रहा है। पहली बार कोई शासनाध्यक्ष इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर रहा है जो उसके पद की गरिमा को धूल में मिलाने वाले हैं।
किसी भी सियासी दल या उसके नेता का ध्येय चुनाव जीतना होता है। इसमें कोई बुराई नहीं है मगर उच्च पदों पर बैठे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे नैतिक और संवैधानिक रूप से ऐसा कोई काम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से नहीं करेंगे, जिससे उनके पद की गरिमा गिरती हो। वह जनहित को ध्यान में रखेंगे और देश के हर नागरिक के हित में काम करेंगे। पिछले पांच सालों में जो हुआ है, उससे तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री सिर्फ किसी एक समुदाय का ही है। वह सियासी फायदे से ऊपर कुछ सोच नहीं पाता। उसके शब्दों में मूल्यों का अभाव है। उसके मंत्रिमंडल के सदस्य और भी छोटेपन को दर्शाते हैं। इस तरह के आरोप लगना ही दुखद होता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो विश्व का भूगोल भारत के मुफीद बना दिया था मगर उन्होंने कभी सियासी फायदे के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया। अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता के बाद उन्होंने उसका श्रेय नहीं लिया था। उन्होंने देश की शांति के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया मगर कभी यह डर नहीं दिखाया कि कोई उन्हें मार देगा या मरवा देगा, जबकि इंदिरा गांधी की सुरक्षा नरेंद्र मोदी की सुरक्षा व्यवस्था का 10 फीसदी भी नहीं थी।
वंदे मातरम न बोलने पर भाजपा के जो नेता देशवासियों को पीटने और राष्टÑद्रोही साबित करने लगते हैं, वही बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार जब प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच शेयर करते हुए भी वंदे मातरम नहीं बोलते, तो कोई दिक्कत नहीं होती। राष्टÑवाद की बात करने वाले इस राष्टÑ शब्द की न उत्पत्ति के बारे में जानते हैं न विस्तार के बारे में। ऋग्वेद में राष्टÑ और राष्टÑवासियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसका पालन करने का सबसे बड़ा उदाहरण भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पांच ऐसे लोगों को मंत्री बनाकर प्रस्तुत किया था, जो चुनाव हारे थे और उनके विरोधी भी थे। इंदिरा गांधी ने अटल बिहारी वाजपेई को देश का प्रतिनिधित्व करने संयुक्त राष्टÑ भेजा था। यह राष्टÑवाद होता है। राष्टÑवाद यह नहीं होता कि सत्ता हासिल करने के लिए उनके साथ मिलकर सरकार बना ली जाये, जो राष्टÑविरोधी गतिविधियों के सूत्रधार हों। नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री वह सब किया जो अनुचित कहा जाता है। उन्होंने विदेश में भी पहुंचकर अपने देश के नेताओं के लिए वे शब्द इस्तेमाल किये जो दुखद थे।
प्रधानमंत्री का पद सहकार का होता है। वह देशवासियों के बीच के वैमनस्य को खत्म करके एक सुखद वातावरण के निर्माण के लिए काम करता है मगर हो उलट रहा है। मोदी ने जिस तरह से विषाक्त माहौल देश में बनाया है वह चिंताजनक है। हम डिजिटल एरा में जी रहे हैं। छोटी-छोटी बातें वैश्विक समाज में पहुंचती है, जो हमारे देश का सम्मान खत्म करने के लिए पर्याप्त होती हैं। विषाक्त माहौल बनाने वालों को दंडित करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जा रही है। प्रज्ञा सिंह जैसी औरतों   का महिमामंडन किया जा रहा है। देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान करने वालों को लांक्षित किया जाता है। यह सब प्रधानमंत्री के संरक्षण में होता है और उनके तमाम मंत्री समर्थन में उतर पड़ते हैं। प्रधानमंत्री चुनावी फायदे के लिए पश्चिम बंगाल में विधायकों की खरीद फरोख्त वाली बात डंके की चोट पर बोलते हैं, नैतिकता की दुहाई देने वाले तमाम नेता इस पर निंदा प्रस्ताव के बजाय समर्थन करते दिखते हैं। हालात तो यह हो गयें कि प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को कहा कि आतंकी अजहर मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित किये जाने से विरोधी दलों में मातम मन रहा है। प्रधानमंत्री यह भूल जाते हैं कि संयुक्त राष्टÑ संघ की कार्यवाही में जिक्र है कि अजहर मसूद को यूरोपीय क्षेत्रों में हमलों के कारण वैश्विक आतंकी घोषित किया गया है, न कि भारत में हुई घटनाओं के कारण।
किसी भी शासनाध्यक्ष का पद गरिमापूर्ण होता है। उसकी जिम्मेदारी समग्र राष्टÑ और राष्टÑवासियों के लिए होती है। शहीदों को उच्च सम्मान देने की होती है। राष्टÑवासियों के बीच वैमनस्य न पनपे इसके लिए अपनी पूरी क्षमताओं को लगा देने की होती है। चुनाव इसी प्रक्रिया में सबको जोड़कर शासन सत्ता स्थापित करने की होती है, जो सबके हित में काम करे। बीते कुछ सालों के दौरान प्रधानमंत्री से लेकर उनके मंत्रियों ने जो व्यवहार किया है, वह राष्टÑ को जोड़ने वाला नहीं  बल्कि तोड़ने वाला है। संस्थाओं को खत्म करने वाला है। अभी वक्त है, अपनी गलतियों को सुधारने के लिये। वह राष्टÑ से माफी मांगे। देश को एकसूत्र में जोड़ने और नागरिकों में सम सद्भाव उत्पन्न करने की दिशा में काम करें, तभी देश और देशवासियों का भला होगा। हम सर्वत्र आगे बढ़ेंगे।
जय हिंद।
अजय शुक्ल
ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Common election between lies and truth: झूठ और सच के बीच हो रहा आम चुनाव

तानाशाह एडोल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ गोयबल्स का एक मशहूर कथन है कि ‘किसी झूठ को इतनी बार कहो कि वह सच बन जाए और सब उस पर यकीन करने लगें।’ 17वीं लोकसभा के लिए देश में हो रहे चुनाव में यही हो रहा है। उच्चतम पदों पर बैठे लोग, जिनसे सच और ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, वो भी झूठ का इतना सहारा ले रहे हैं कि लोकतंत्र का यह महापर्व झूठ और सच की लड़ाई में तब्दील हो गया है। फैसला अंतत: जनता को ही करना है कि वो किसके साथ खड़ी होती है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लीचिंग के मामलों की सुनवाई करते हुए चिंता जताई थी कि क्या लोकतंत्र, भीड़ तंत्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की यह चिंता जायज थी क्योंकि झूठ का सहारा लेकर जिस तरह से हमले किये जा रहे हैं। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले नेताओं का चरित्र हनन किया जा रहा है। झूठ बोलकर उन्हें तमाम बुराइयों का पुतला साबित किया जा रहा है, वह दुखद है। वो महानायक जिन्हें झूठ के सहारे बदनाम कर अपना कद बढ़ाने की सियासत हो रही है, अपना पक्ष रखने को मौजूद ही नहीं हैं।
अदालत में आतंकी होने का आरोप तय होने के बाद भी उस भाजपा ने प्रज्ञा सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया जो राष्ट्रवाद का रट्टा लगाते नहीं थकती। उसने भी देश के लिए शहीद होने वाले एक जांबाज पुलिस अफसर के चरित्र को कलंकित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया। अपने प्रत्याशी के बचाव में भाजपा के शीर्ष नेताओं ने लगातार झूठ पर झूठ बोला। इस महिला को अगर छोड़ दें तो दूसरी महिला केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी हैं, जिन्होंने चौथी बार चुनाव आयोग को दाखिल अपने शपथ पत्र में ‘सच’ को बदला है। बार-बार उनके बदलते शपथ पत्र से उनका झूठ पकड़ा गया मगर चुनाव आयोग लाचार दिखा। सबसे बड़ा उदाहरण हमारे प्रधानमंत्री का है जिनके शपथ पत्र की भी सूचनाएं बदलती रही हैं। उन्होंने खुद को संत, महात्मा, फकीर साबित करने के लिए कई कहानियां बयां की हैं। कभी वह वीर बालक बन जाते हैं जो मगरमच्छ के मुंह से गेंद छीन लाता है, तो कभी वह चाय वाले और अब तो वह हिमालय-काशी के तपस्वी बालक भी बन गये हैं।
बहराल, हमें उनके इस महिमा मंडन से कोई आपत्ति नहीं क्योंकि यह उनकी मर्जी है। उनके समर्थक अगर इसमें खुश हैं तो हमें आपत्ति होनी भी नहीं चाहिए, मगर प्रधानमंत्री पद की गरिमा गिराने से आपत्ति जरूर है। इस पद पर बैठा व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं, बल्कि देश का आइना होता है।
मोदी मंत्रिमंडल की सदस्य रहीं उमा भारती ने प्रियंका गांधी वाड्रा के लिए चोर की बीवी शब्द का इस्तेमाल किया। उमा भारती पर स्वयं गंगा सफाई के नाम पर धांधली का आरोप है। किसी महिला के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करते उनको भारतीय संस्कार याद नहीं रहे। पिछले पांच साल से सरकार राबर्ट वाड्रा को चोर साबित करने में लगी है मगर अब तक एक भी आरोप पत्र नहीं बना पाई। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक के चरित्र से लेकर तमाम बातों में उनको कलंकित करने की झूठी कहानियां और फोटो फैलाई जाती हैं, जिनमें कोई सच्चाई नहीं हैं। यह सब हमारी संस्कृति और सभ्यता के खिलाफ हो रहा है। पुराने नेताओं के खिलाफ जहर बोने के लिए झूठ पर झूठ गढ़ा जा रहा है मगर हमारे नीति नियंता इस पर न सिर्फ चुप्पी साधे हैं, बल्कि उसको बढ़ावा दे रहे हैं। सियासी फायदे के लिए वह किया जा रहा है जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। हमारा संविधान हर व्यक्ति को इतनी शक्ति देता है कि वह अपना प्रतिनिधि चुन सके। सवाल वहीं खड़ा है कि क्या परोसे गये झूठ पर लोकतंत्र का निर्माण होने लगा है? क्या जीत का रास्ता झूठ से निकलता है और क्या झूठ पर ही हमारा मतदाता यकीन करता है? शायद जवाब हां आएगा क्योंकि मतदाता स्वयं सच तलाशना नहीं चाहता।
तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य चाणक्य ने कहा था कि व्यक्ति पद से बड़ा नहीं बनता, बल्कि व्यक्तित्व से बनता है। अपने व्यक्तित्व को बड़ा बनाने के लिए पूर्व में हुए महान व्यक्तित्व के लोगों को कलंकित करना अपराध है। ‘बड़ों’ से शब्दों की गरिमा की भी उम्मीद की जाती है मगर इस लोकतंत्र के उत्सव में शब्दों की गरिमा कथित बड़ों ने ही गिराई है। हमारे सैनिकों के कुछ छोटे आॅपरेशंस को झूठ के सहारे महिमा मंडित किया गया जैसे उन्होंने कोई देश फतह कर लिया हो। पूरा विश्व जानता है कि भारत पाकिस्तान के बीच 1947, 48, 65 और 71 में सीधे युद्ध हुए। इन सभी में पाकिस्तान को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। 1965 में हमारी सेनाओं ने लाहौर में तिरंगा फहराया और 1971 में न केवल तिरंगा फहराया, बल्कि पाक सेनाध्यक्ष सहित 92 हजार सैनिकों को बंदी बनाया गया। पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये गये। इसके बाद पाकिस्तान की आज तक सीधे युद्ध की हिम्मत नहीं हुई। 1999 में कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ पर उन्हें खदेड़ा गया मगर यह युद्ध नहीं था। 2017 और 2019 में चुनाव के तुरंत पहले सेना के एक आॅपरेशन को ऐसे प्रस्तुत किया गया, जैसे हमने बड़ा युद्ध जीत लिया हो। झूठ और सच के बीच सैन्य कार्रवाई को चुनाव जीतने का आधार बना लिया गया। सवाल फिर वहीं खड़ा हो गया कि क्या भारत का मतदाता इतना मूर्ख है, जो सच और झूठ के बीच अंतर नहीं कर पाता? वह झूठ को ही स्वीकार कर लेता है क्योंकि इतना झूठ बोला जाता है कि वह सच लगने लगे!
हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। लोकतंत्र में सिर गिने जाते हैं, वो सिर नैतिक लोगों के हों या अनैतिक लोगों के। इसी बात का फायदा उठाने के लिए हर तरह से झूठ बोला जा रहा है। इस वक्त कोई देशभक्ति और देश के लिए अपना सबकुछ देने वालों पर चर्चा नहीं कर रहा। चर्चा ‘वाद’ पर हो रही है। कहीं जातिवाद, कहीं धर्मवाद, कहीं क्षेत्रवाद तो कहीं राष्ट्रवाद। आश्चर्य की बात तब लगती है जब हम देखते हैं कि वो लोग राष्ट्रवाद की बात कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र के लिए कुछ नहीं किया है। वह लोग धर्मवाद कर रहे हैं जिन्हें धर्म का ज्ञान ही नहीं है। वो लोग जाति के संरक्षक बने हैं जो जातियों के नाम पर सालों से सुख भोगते रहे मगर किया कुछ नहीं। वह लोग क्षेत्रवाद की बात करते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र को उन्नत बनाने के लिए कुछ नहीं किया। हम गलती उन नेताओं की नहीं मानते जो झूठ बोल रहे हैं, बल्कि गलती उस मतदाता की है जो झूठ को बगैर परखे स्वीकार कर लेता है।
हम उम्मीद करते हैं कि खुद को शिक्षित कहने वाले मतदाता कम से कम सच और झूठ में अंतर करना सीखेंगे। वो सच के साथ खड़े होने का हौसला दिखाएंगे। अगर हम झूठ के साथ खड़े रहे तो सच की हत्या होगी। झूठ का राज जब स्थापित होगा तो फिर हमको किसी भी उस चीज की अपेक्षा करने का अधिकार नहीं होगा जो एक अच्छे शासन और शासक से की जाती है। यह आम चुनाव झूठ और सच के बीच हो रहा है, फैसला आपको करना है कि किसे चुनेंगे।

जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Hot seat Varanasi analysis by Ajay Shukla: हॉट सीट वाराणसी का विश्लेषण- अजय शुक्ल: फिलहाल मोदी के मुकाबले नहीं है कोई कद्दावर

विश्व का प्राचीनतम शहर काशी, बाबा विश्वनाथ की जयकार के साथ आंखें खोलता और उन्हें शयनासन देकर ही सोता है। बदलाव की बयार के साथ चलने वाले वाराणसी संसदीय क्षेत्र ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही तवज्जो दी है। 1991 में पहली बार भाजपा को यहां से जीत क्या मिली फिर सात चुनाव उसके ही खाते में आये। पिछले 22 साल से यहां के नगर निगम से लेकर शहरी विधायक तक भाजपा को ही मिले हैं। गुजरातियों के साथ रोटी-रोजगार का रिश्ता इतना मजबूत रहा कि नरेंद्र मोदी जब यहां पहुंचे तो सब ने उन्हें हाथों हाथ लिया। झूठी सच्ची कहानियों के बीच यहां मस्ती की बयार बहती है। चर्चा काशी के मोहल्ले से लेकर विश्व के तमाम शहरों तक होती है। देश की 16वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री देकर यहां के लोग खुशियां मना रहे हैं। नरेंद्र मोदी के लिए यही सोच मुफीद साबित होती है। वह गुरुवार को यहां दोबारा नामांकन करने पहुंच रहे हैं। माना जाता है कि काल भैरव ने जिसके लिए हां कर दी वही यहां का नुमाइंदा होता है।
2014 में सबकी नजरें काशी पर थी, क्योंकि भाजपा के पीएम इन वेटिंग गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से यहां आकर चुनाव लड़ रहे थे। उनका मुकाबला करने हरियाणा के लाल दिल्ली के तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल आये थे। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मैदान में हैं और उनका मुकाबला करने को फिलहाल कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया है। मोदी के मुकाबले सैन्य जवानों को जानवरों जैसा खाने देने का खुलासा करने के आरोप में बर्खास्त तेजबहादुर यादव ताल ठोक रहे हैं। गठबंधन ने कांग्रेस से सपा में आई शालिनी यादव को प्रत्याशी बनाया है। चर्चा में है कि कांग्रेस की धीर-गंभीर इंदिरा की छवि रखने वाली प्रियंका गांधी वाराणसी में मोदी की सांसें फुलवा सकती हैं। नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और मतदान 19 मई को होना है। बहराल चाहे जो आये, यहां के चुनाव पर पूरे विश्व की निगाह होना लाजिमी है।
केजरीवाल ने भी किया था गजब
पिछले आम चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल ने बगैर किसी आधार के चुनाव लड़ा था। उन्होंने 2 लाख 9 हजार 238 वोट लेकर यह साबित किया था कि अगर जमीनी आधार वाला कोई नेता आए तो वह गजब ढा सकता है। हालांकि भाजपा के मोदी ने उन्हें 3 लाख 71 हजार 784 वोटों के अंतर से हराया था। मोदी को 5 लाख 81 हजार 22 वोट मिले थे। भूमिहार और मुस्लिम वोटों के सहारे कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय सिर्फ 75 हजार 614 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे थे। दलित-मुस्लिम के सहारे बसपा के प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल को 60 हजार 579 और यादव-मुस्लिम वोटों के साथ पनवाड़ियों के वोट के सहारे सपा के कैलाश चौरसिया को 45 हजार 291 वोट मिले थे। इस लोकसभा सीट क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र रोहनियां, सेवापुरी, वाराणसी उत्तर, दक्षिण और छावनी आते हैं। यह पांचों विधायक भाजपा के ही हैं। मेयर भी दो दशक से भाजपा का ही है।
कम नहीं हैं चुनौतियां
वैसे 2019 के चुनाव में मोदी को खास चुनौती नहीं है मगर उनसे शिकायतें भी लोगों की कम नहीं है। जिन गांवों को उन्होंने गोद लिया वे बदहाल हैं। काशी को क्वेटा बनाने का दावा लोगों को टीस देता है। श्रीकाशी विश्वनाथ कारीडोर के नाम पर तोड़े गये मंदिर भी चुनौती हैं। एयरपोर्ट तक बेहतरीन सड़क बाहर से आने वालों को सुखद अनुभूति कराती है मगर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की दुर्दशा चर्चा में रहती है। नगर प्रशासन से लेकर केंद्र की सरकार के बावजूद बनारस की बदहाली लोगों को टीस देती है। न रोजगार, न व्यापार और न सुविधायें लोगों को दुखी करती हैं। सड़कों और गलियों की बदतर हालत के साथ ही बेरोजगारी भी यहां के लोगों की समस्या है। लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र जो हिंदुत्व का सिरमौर है फिर भी हालत खराब है।
बदलाव की सियासत का हिस्सा रही है यह सीट
काशी का इतिहास बदलाव के करीब रहा है। ब्राह्मणों, यादवों, भूमिहारों, वैश्य, दलित, पिछड़ों और मुस्लिम वोटरों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संसदीय क्षेत्र में देश के विभिन्न राज्यों की आबादी भी है। बंगाली और गुजराती भी यहां दम दिखाते हैं। बम बम भोले के नाम से शुरू और उसी पर खत्म जैसी बातें आम हैं। आजाद भारत के इतिहास में 1952 से पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु तक हुए सभी तीनों चुनावों में कांग्रेस के रघुनाथ सिंह जीते। 1967 में इंदिरा विरोधी लहर और वामपंथी विचारधारा जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय से निकली तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रघुनाथ सिंह ने 1967 में जीत दर्ज कराई। 1971 में इंदिरा गांधी के आने मात्र से कांग्रेस के राजाराम शास्त्री की नैय्या पार लग गई मगर 1977 में जनता पार्टी के युवा तुर्क नेता चंद्रशेखर ने परचम लहराया। 1980 में इंदिरा गांधी के सिपहसालार पंडित कमलापति त्रिपाठी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली में हराने वाले राजनारायण को चित कर दिया। 1984 में राजीव गांधी का आशीर्वाद लेकर कांग्रेस के सिपाही श्यामलाल यादव ने जीत दर्ज कराई। 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर में कांग्रेस छोड़ जनतादल पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने सीट कब्जा ली। 1991 में भाजपा की टिकट पर पूर्व डीजीपी श्रीषचंद्र दीक्षित ने इस सीट पर जीत दर्ज कराई। इसके बाद यह सीट भाजपाई हो गई और 1996, 1998 और 1999 में शराब माफिया शंकर प्रसाद जायसवाल जीतते रहे। 2004 में काशी विश्वविद्यालय के छात्रनेता डा. राजेश कुमार मिश्र ने एक बार फिर से यहां कांग्रेस को जीत दिलाई। 2009 में डा. मुरली मनोहर जोशी ने फिर से यह सीट भाजपा को दिला दी और 2014 में वह नरेंद्र मोदी के लिए यह सीट छोड़कर कानपुर चले
अनेकता में एकता का प्रतीक है वाराणसी
वाराणसी विश्व शहर माना जाता है। बनारस और काशी के नाम से पुकारे जाने वाले वाराणसी में विश्व बसता है। सनातनधर्मियों के प्रमुख भगवान शिव की नगरी के तौर पर इसे पहचान मिलती है। यहां सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के भी पवित्र स्थान हैं। गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के सारनाथ में ही दिया था। हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र मानी जाने वाली काशी को अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है। यहां की संस्कृति में गंगा माई और श्रीकाशी विश्वनाथ का अटूट रिश्ता है। बनारस को मंदिरों का शहर, भारत की सांस्कृतिक राजधानी, भगवान शिव की नगरी जैसे विशेषणों से भी नवाजा जाता है। यहां औघड़ संतों, कबीरपंथियों और रैदास मतावलंबियों के तीर्थ भी हैं। यहां बंग्ला भाषियों से लेकर गुजरातियों और पंजाबियों से लेकर दक्षिण भारतियों के मोहल्ले मौजूद हैं। हर धर्म और संप्रदाय को यहां पूरा सम्मान मिलता है। काशीवासी मुंह में पान और ठंडाई के साथ मस्त मिलते हैं। यहां की संस्कृति में प्रेम और मित्रता आम है। भारतीय शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना विश्वविख्यात है। यहां से कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ निकले हैं। कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि ऐसे ही कुछ नाम हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण की हिंदी रचना रामचरितमानस यहीं लिखी थी।

SAMANA SAWALO KA BY AJAY SHUKLA WITH KALRAJ MISHRA: मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर संगठन शास्त्र के ज्ञाता हैं : कलराज मिश्र

अंबाला। आज स्थिति यह है भारतीय जनता पार्टी केवल देश की ही नहीं, दुनिया की भी सबसे बड़ी पार्टी है। देश के कई प्रदेशों में भी आज भाजपा की सरकार है। मेरी आयु के कारण शारीरिक रूप में जरूर अंतर आया होगा, लेकिन सोच, चिंता और दृढ़ता, सैद्धांतिकता, समर्पण में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं आया। मैं मार्गदर्शक मंडल में नहीं हूं, मार्गदर्शक मंडल में हमारे आडवानी जी व डॉक्टर जोशी जी हैं। यह लोग हमारे प्रेरणास्रोत हैं। पार्टी जो भी जिम्मेदारी दे रही है, मैं उस पर काम कर रहा हूं। सामाजिक समरसता का यदि कोई निर्माण कर सकता है तो वह भारतीय जनता पार्टी है। इंडिया न्यूज हरियाणा के सामना सवालों का में भाजपा के कद्दावर नेता और हरियाणा लोकसभा चुनाव प्रभारी कलराज मिश्र आईटीवी नेटवर्क (मल्टी मीडिया) के प्रधान संपादक अजय शुक्ल के सवालों का मझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह बखूबी जवाब दे रहे थे। प्रस्तुत हैं सवाल और जवाब के प्रमुख अंश।

सवाल: जनसंघ से लेकर भाजपा में आप प्रचारक के रूम में शामिल हुए। उस जनसंघ और आज के भाजपा में क्या अंतर है?
जवाब: भारतीय जनसंघ के समय हमारी पार्टी बहुत सीमित थी। उस समय जनसंघ के बारे में यही कहा जाता था कि किसी को सहयोग देकर सरकार बनाने में सहयोगी तो हो सकती है, लेकिन सरकार नहीं बना सकती। आज भिन्न स्थिति का निर्माण हो गया है। आज स्थिति यह है भारतीय जनता पार्टी केवल देश की ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है और केवल केंद्र में ही नहीं राज कर रही, बल्कि देश के कई प्रदेशों में भी भाजपा की सरकार है।

सवाल: उत्तराखंड बनाने में आपकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। जब उत्तराखंड का गठन किया गया तो आप उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और लोक निर्माण के मंत्री और महामंत्री भी थे, उस दौरान उत्तर प्रदेश से अलग तोड़कर उत्तराखंड राज्य बनना था, एक आंदोलन चल रहा था, उसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब: उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश एक होते थे, जिसे उत्तर प्रदेश कहा जाता था। महामंत्री के रूप में मैने पूरे उत्तराखंड का शायद ही कोई ब्लॉक होगा, जिस ब्लॉक में मेरा जाना न हुआ हो। मुझे तो लोग कहते थे कि मैं उत्तर प्रदेश में बनारस या गाजीपुर का रहने वाला नहीं हूं, यह तो कुमायु अथवा गढ़वाल के रहने वाले हैं। इसलिए उस भ्रमण का यह परिणाम था कि आज जो नेतागण दिख रहे हैं वह सब हमारे संबंधों के आधार पर आए हुए लोग हैं। उस समय यह बात चलती थी कि उत्तराखंड अलग होना चाहिए। इसके लिए बार-बार आंदोलन चलाया गया। बाद का जो आंदोलन चला उसके संयोजक के रूप में मैं रहा, जब हमारी सरकार बनी तो उत्तरखंड अलग बने इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया गया। मायावती के साथ में जब सरकार बनी थी तो उस समय भी उत्तराखंड को अलग बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया था, लेकिन उस समय नहीं हो पाया। बाद में जब केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो प्रस्ताव पास कर दिया गया और उत्तराखंड को अलग राज्य बनाया गया। उत्तराखंड राज्य बनाने में उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और मैं मंत्री था, उस समय मुझे संयोजक बनाया गया था, पूरे उत्तराखंड में कौन-कौन से क्षेत्र हैं, कैसे-कैसे क्या होना चाहिए उस करके उत्तराखंड बना।

सवाल: गाजीपुर से देवरिया, बनारस और वहां से लेकर लखनऊ के पूर्वी से लेकर पश्चिमी क्षेत्र में आपने जमीनी स्तर पर काम किया था, वर्ष 1991 में अटलजी चुनाव लड़ रहे थे और आप कमान को संभाल रहे थे। वह एक दौर के और आज के कलराज मिश्र में क्या फर्क है?
जवाब: उस समय कलराज मिश्र पूरे युवा थे, आज कलराज मिश्र बुजुर्गों की श्रेणी में आ गए हैं। उस समय भी जो जिम्मेदारी दी जाती थी, उसको प्राथमिकता, ईमानदारी और परिश्रम के साथ पालन करते थे। इस समय भी मुझे जो भी जिम्मेदारी दी जा रही है आयु की चिंता न करते हुए जिम्मेदारी का निर्वहन करने का प्रयास करता हूं, इसमें तो कोई अंतर नहीं आया। लेकिन आयु के कारण शारीरिक रूप में जरूर अंतर आया होगा, लेकिन सोच, चिंता और दृढ़ता, सैद्धांतिकता, समर्पण में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं आया।

सवाल: आपके तमाम शिष्य कोई मुख्यमंत्री, डिप्टी सीएम और कोई देश का गृहमंत्री बन गया। अब आप कहीं मार्गदर्शक की श्रेणी में दिखाई देते हैं। यह क्यों हो रहा है?
जवाब: मैं मार्गदर्शक मंडल में नहीं हूं, मार्गदर्शक मंडल में हमारे आडवानी जी, डॉक्टर जोशी जी हैं। यह लोग हमारे प्रेरणास्रोत हैं। पार्टी जो भी जिम्मेदारी दे रही है मैं उस पर काम कर रहा हूं। यह बात सही है, जितने भी उत्तर प्रदेश और केंद्र के कई लीडरशिप रहे हैं जिनके यहां तक पहुंचने में मेरा अहम योगदान रहा है। मैं सहयोगी के रूप में रहा हूं, सहयोगियों के अंदर कार्य करने की प्रतिभा और क्षमता को समझकर उचित स्थान दिलाने के लिए हमने लगातार प्रयास किया है। यदि उसके लिए संघर्ष करना पड़ा है तो संघर्ष भी किया है।

सवाल: हरियाणा को दिल्ली तीन तरफ से घेरता है, यह बहुत महत्वपूर्ण है। इस राज्य में आपको कमान दी गई है। भाजपा ने पिछले चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। आपके ऊपर अब यह जिम्मेदारी है कि सही प्रत्याशी का चयन करें कि भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर लोकसभा चुनाव कीर्तमान स्थापित करे।
जवाब: एक महीने पहले मुझे यह जिम्मेदारी दी गई कि लोकसभा चुनाव के प्रभारी के रूप में आप रहेंगे। यहां योग्य लोग हैं, अनिल जैन जी अखिल भारतीय के महामंत्री हैं जो वहां के प्रभारी हैं। मुख्यमंत्री मनोहरलाल जी संगठन शास्त्र के ज्ञाता और संगठन मंत्री भी रहे हैं। वहीं राम बिलास शर्मा जी बहुत पुराने और भाजप को आगे बढ़ाने में योगदान देते रहे हैं। यहां टीम और अन्य लोगों से मिलने के बाद यह तय हो गया कि केंद्र और प्रदेश सरकार ने कल्याणकारी कार्य पारदर्शिता पूर्ण किया है। यह रणनीति बनाई कि हम हरियाणा की दस की दस सीटों को जीते, इसी पर हमारा काम चल रहा है।

सवाल: हरियाणा में भाजपा सरकार के साढ़े चार साल हो चुके हैं। इस दौरान हरियाणा सरकार के जो काम रहे हैं उस पर पक्ष कुछ और विपक्ष कुछ कहता है। ऐसे दावे के बीच में आप क्या समझते हैं कि जनता मनोहर लाल के दावे पर मुहर लगाएगी?
जवाब: मुझे विश्वास है कि यहां जो कार्य हुआ है संगठन के आधार पर हुआ है। इस कौशल से हुआ है कि जिसके आधार पर जनता विश्वास कर सकती है। साढ़े चार साल के मनोहर लाल की सरकार पर किसी भी प्रकार का आरोप नहीं है, यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। सबसे बड़ा उदाहरण देना चाहूंगा कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जो कार्य इतनी पारदर्शिता पूर्ण किए हैं कि पहली बार लोगों को लगा कि बिना पैसे दिए हुए भी घर बैठे गु्रप डी का नियुक्ति पत्र मिल गया। मैं मानकर चलता हूं कि सुशासन प्रदान करने में आम आदमी में जो विश्वास पैदा हुआ है इसमें हमारी सरकार की उपलब्धि काफी सहयोगी रही। इसी आधार पर हम चुनाव जीतेंगे।

सवाल: जब आप उत्तर प्रदेश की बात करते हैं तो केंद्र की सत्ता की डोरी यूपी से चलती है। यूपी में भी आपका अपना क्षेत्र बनारस है, जहां से बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद लेकर आप आगे बढ़ते हैं, मोदी जी ने भी बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद लिया तो आपको लगता है कि इस बार बनारस फिर वैसे ही सहयोग देगा जैसे देता आया है?
जवाब: आज वाराणसी में कोई जाता है तो उसको लगता है कि सांस्कृतिक स्वरूप, वाराणसी की स्वच्छता, मां गंगा का सौंदर्यीकरण व निर्मल धारा इस बात को प्रगट कर रही है कि वर्तमान प्रधानमंत्री ने गंगा, वाराणसी और उस क्षेत्र का जो सांस्कृतिक स्वरूप है, को मूर्तिरूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है।

सवाल: प्रियंका गांधी गंगा में सफर करके प्रयाग से वाराणसी, काशी तक पहुंचती है और कहतीं हैं कि कुछ नहीं हुआ।
जवाब: मुझे लगता है प्रियंका जी विरोधी दल की महासचिव हैं उनका यह कहना बड़ा स्वभाविक है। लेकिन वह (प्रियंका गांधी) स्वयं अनुभव करती हैं कि गंगा की निर्मल और स्वच्छता उन्होंने (प्रियंका) कभी देखी नहीं होगी। गंगा के घाट का स्वरूप और इतना स्वच्छ कभी देखा नहीं होगा। इससे पहले उन्होंने (प्रियंका) ने कभी गंगा का भ्रमण ही नहीं किया होगा। उन्होंने प्रथम बार मां गंगा के रास्ते भ्रमण किया, इसलिए उन्हें यह कल्पना नहीं होगी कि इससे पहले गंगा कैसी थी। मुझे यह लगता है उनका (प्रियंका) गंगा का भ्रमण करना, गंगा का आकर्षण ने उनको अपनी ओर खींचा।

सवाल: उत्तर प्रदेश में लोकनिर्माण मंत्री रहते हुए आपने गड्ढा मुक्त सड़कों की शुरुआत की थी। इसे अटल जी ने एक ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में लिया। भाजपा उस प्रोजेक्ट को पूरे देश में क्यों नहीं ला सकी?
जवाब: गड्ढा मुक्त और चौड़ीकरण का अभियान हमने चलाया था, जो सफल हुआ।

सवाल: आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुहिम को सफल नहीं कर पा रहे हैं। चंडीगढ़ से अंबाला होते हुए जैसे ही यमुनानगर क्रॉस करेंगे, वहां लिखा आएगा कि उत्तर प्रदेश आपका स्वागत करता है, वैसे की गड्ढायुक्त सड़कें देखने को मिल जाएंगी।
जवाब: इस समय भी गड्ढामुक्त अभियान लोगों ने चलाया है। उसे ठीक करने का प्रयास सरकार की ओर से किया जा रहा है।

सवाल: आपको (कलराज मिश्र) भारतीय जनता पार्टी के एक ब्राह्मण नेता के रूप में माना जाता रहा है। आपको ऐसा चेहरा माना जाता रहा है कि जब जहां जरूरत हो तो वहां फिट कर दिया जाए।
जवाब: मैं एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूं। उस परिवार में पैदा होने का मुझे गर्व है। मैं समाज के हर वर्ग को अपना व्यक्ति मानता हूं। इसका परिणाम यह है कि ठीक है ब्राह्मण वर्ग और समाज के लोग हमें ऊंचा स्थान देते हैं। यह उनकी कृपा और आशीर्वाद है। मैं समाज के सभी वर्ग के साथ जुड़कर काम करता हूं, सभी को आगे बढ़ाने का प्रयास करता हूं। मैं सभी का नेता हूं।

सवाल: आज भी याद आता है कि जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री होते थे और राजनाथ सिंह प्रदेश अध्यक्ष, फिर ऐसा हुआ कि कलराज मिश्र को वापस प्रदेश अध्यक्ष बनाना पड़ा था। वह दौर था, जब भारतीय जनता पार्टी में शब्दों की गरिमा होती थी। भारतीय जनता पार्टी का मतलब संस्कार होते थे। आज की राजनीति में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
जवाब: मैंने उत्तर प्रदेश में 10 साल राजनीति की। बाद में हमें जबरदस्ती मंत्रीमंडल में रखा गया। समय-समय पर विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियां चाहे वह संगठन अथवा मंत्रीमंडल की ही दी गई। हमने जिम्मेदारी को पूरी निष्टा से पूरा किया। जहां तक शब्दों के मर्यादा का प्रश्न है यह व्यक्ति विशेष से संबंधित है। शब्द ब्रम्ह है, ब्रम्ह-ब्रम्ह होता है। ब्रम्ह की मर्यादा को सुनिश्चित करना हमारा नैतिक दायित्व है। शब्दों की भी पूजा अर्चना करनी चाहिए। शब्दों की यदि पूजा अर्चना करनी है तो उसकी मर्यादा को बनाए रखना होगा। किसी की आलोचना भी करनी है तो वह भी मर्यादित होनी चाहिए। शब्दों का उन्मूलन हम ब्रम्ह का उन्मूलन मानते हैं। इसलिए हम यह सदैव प्रयास करते हैं कि हमारे द्वारा शब्द रूपी द्रव्य का उन्मूलन न होने पाए।

सवाल: हरियाणा ऐसा रहा है कि यहां 36 बिरादरी है, यहां वैश्य समुदाय का बहुत बड़ा योगदान है। यह अग्रसेन महाराज का क्षेत्र है। यह वह क्षेत्र हैं जहां जाट ने ऊसर जमीन को उपजाऊ जमीन बनाया। यह वह राज्य है जहां इंडस्ट्री की लंबी इमारत खड़ी हो गई है। ऐसे में यहां आपकी सरकार पर आरोप लगता है कि यहां समाजिक विषमताएं पैदा की हैं, क्या सच है?
जवाब: यह कदापि सच नहीं है, हम जिस गीता की आराधना और उपासना करते हैं वह गीता यहीं से सृजित हुई है। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश के माध्यम से गीता सृजन यहीं से हुआ है। हम तो गीता के उपासक हैं, यहां सब समान हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यह उपदेश दिया है कि सभी समान और एक हैं। सामाजिक समरसता का यदि कोई निर्माण कर सकता है तो वह भारतीय जनता पार्टी है।

Analysis of communal politics by Ajay Shukla: सांप्रदायिक सियासत का विश्लेषण-अजय शुक्ल: अटल पर हुए प्रयोग को अपना लिया भाजपा ने

17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में सांप्रदायिकता एक बड़ा मुद्दा है। भारतीय जनता पार्टी की नीव ही इस पर टिकी है। यही कारण है कि अन्य दल भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं। हालांकि तमाम अन्य दल भी विभिन्न धर्मों को आधार बनाकर चुनाव लड़ते हैं। राम मंदिर से लेकर हिंदू-मुस्लिम हकों की बात विभिन्न दल अपनी परिभाषा के मुताबिक करते हैं। भाजपा ने यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी उस शख्स को सौंपी जो खांटी महंत है। योगी आदित्यनाथ विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे। उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए बैकडोर इंट्री विधानपरिषद से दी गई। इसके अलावा कई जगह भगवाधारी कथित साधुओं और साध्वियों को उतारा गया। भाजपा ने यह प्रयोग उमा भारती से मध्यप्रदेश में किया था, जो सफल रहा था। इसी क्रम में भाजपा ने अब अदालत में आतंकी होने का आरोप निर्धारित होने के बावजूद प्रज्ञा सिंह को कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतारा है।
प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसी आतंकी के टिकट देने को लेकर स्वयं नरेंद्र मोदी के उस बयान पर सवाल खड़े होने लगे हैं जो उन्होंने 2014 में कहे थे कि उनकी पार्टी में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं। वे अदालत में चार्जफ्रेम हो चुके किसी शख्स को टिकट नहीं देंगे। प्रज्ञा सिंह के खिलाफ जांच में आतंकी होने के सबूत अदालत में एनआईए ने प्रस्तुत किये थे, जिन पर आरोप निर्धारित हो चुका है। प्रज्ञा को सेहत खराब होने और इलाज कराने के लिए जमानत दी गई थी, मगर वह इस वक्त चुनाव में ऐसे दौड़ती नजर आ रही हैं जैसे उन्हें कोई रोग ही नहीं। प्रज्ञा की जमानत रद्द कराने को लेकर एक याचिका दाखिल हो चुकी है। वह चर्चा में इसलिए आ रही हैं क्योंकि उन्होंने आतंकवाद से लड़ते हुए शहीद हुए वीर पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे पर अभद्र टिप्पणी की थी। इसके बाद पूरे देश में प्रज्ञा और भाजपा की किरकिरी हुई है। भाजपा प्रज्ञा के सहारे यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह अकेली हिंदूवादी है और इस वाद के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है।
चुनाव में हिंदू-मुस्लिम की शुरूआत करने का श्रेय भी जनसंघ को ही जाता है। 1952 में अटल बिहारी वाजपेई लखनऊ से चुनाव हार चुके थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बाद जनसंघ में कोई ऐसा नेता नहीं था जो संसद में मुखर होकर बात रख सके। पंडित दीन दयाल उपाध्याय चाहते थे कि अटल बिहारी वाजपेई किसी भी सूरत में संसद पहुंचे। उन्होंने 1957 के लोकसभा चुनाव में अटल को लखनऊ के अलावा हिंदू बाहुल्य वाली सीट मथुरा तथा नई बनी बलरामपुर सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला किया। अटल लखनऊ से तो हारे ही मथुरा में निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप ने उनकी जमानत जब्त करा दी। बलरामपुर सीट पर अटल बिहारी वाजपेई ने नौ हजार से अधिक मतों से जीत दर्ज कराई। इस सीट पर अटल को सांप्रदायिक कारणों से ही लड़ाया गया था।
बलरामपुर में हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी थी। राजा बलरामपुर के गुरू होने के कारण करपात्री जी का खासा प्रभाव था। 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव में उतरे, तो करपात्री जी ने अटल बिहारी का समर्थन किया। अटल के प्रतिद्वंदी कांग्रेस के प्रत्याशी हैदर हुसैन थे। जनसंघ और करपात्री जी ने इस चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील कर दिया, नतीजतन वाजपेयी करीब 9 हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीत गए। मजबूरन 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अंबाला और करनाल से सांसद रह चुकीं ब्राह्मण चेहरा मानी जाने वाली सुभद्रा जोशी को बलरामपुर सीट से अटल बिहारी वाजपेयी के मुकाबले मैदान में उतारा और उन्होंने अटल को शिकस्त दी। इस चुनाव के बाद जनसंघ ने इस कार्ड को अपना हथियार बना लिया। दो सीट वाली भाजपा को सत्ता की इस ऊंचाई तक लाने में अब तक यही कार्ड कारगर रहा है। राममंदिर के नाम पर विध्वंसक रूप से खेले गये इस चुनावी खेल को अब उग्र हिंदुत्व में तब्दली किया जा चुका है। नतीजतन नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने और अब हिंदू आतंकवाद शब्द की कारक बनी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारकर फिर से सत्ता की राह तलाशी जा रही है।

Can not make anything, Do not waste anything: कुछ बना नही सकते, तो बर्बाद मत करिये

दो माह पहले दिल्ली के एक पंच सितारा होटल में हमारे एक पुराने मित्र मिले। दिल्ली के एक अच्छे इलाके में फ्लैट लिया था, वहीं रह रहे हैं। हालचाल पूछने पर बोले सब अच्छा है। जेट एयरवेज में पायलट की नौकरी है। आज उसका फोन आया तो रो पड़े। बोले, भाई फ्लैट की किस्त तीन महीने से नहीं दे पाया हूं। बैंक लोन का नोटिस आ गया है। डीजीएम से बात करके कुछ वक्त दिला दो। कंपनी बंद हो गई है, पिछले चार माह से वेतन भी नहीं मिला है। इस वक्त मार्केट में नौकरी भी नहीं है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं? यह सिर्फ एक युवा का दर्द नहीं बल्कि ऐसे तमाम उद्योगों और संस्थानों में काम करने वालों की हालत खराब है। निजी उपक्रमों के साथ ही सरकारी उपक्रमों (पीएसयू) भी बदतर हो रही है। पिछले पांच सालों में बर्बादी की रफ्तार कम होने के बजाय बढ़ी है। वजह साफ है कि हमारी सरकार की नीतियों ने सरकारी उपक्रमों को संबल देकर सुधारने के बजाय उन्हें गलत राह पर ढकेल दिया है। नतीजतन बीमार हो चुके इन सरकारी उद्यमों में कार्यरत लाखों लोगों का रोजगार संकट में फंस गया है। उद्योग बंदी की कगार पर हैं।
संसद के शीतकालीन सत्र में कैग ने पीएसयू (सार्वजनिक उपक्रम) को लेकर अपनी रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया कि 2014-15 के वित्तीय सत्र में 132 सार्वजनिक उपक्रमों को 30861 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ था। जो 2016-17 वित्तीय वर्ष में बढ़कर 104730 करोड़ रुपए हो गया है। औसतन सालाना 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक का शुद्ध घाटा जुड़ रहा है। इसकी वजह खराब प्रबंधन और दूरगामी नीतियों का अभाव है। कैग ने एक हजार करोड़ से ज्यादा के नुकसान वाली सरकारी कंपनियों की अलग से रिपोर्ट बनाई है। सबसे अहम बात तो यह है कि लाभ कमाने वाली कंपनियां भी नुकसान में आ गईं हैं। स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया (सेल) को 3187 करोड़ का घाटा हुआ जबकि एमटीएनएल को 2941 करोड़, हिंदुस्तान फोटोफिल्म्स कंपनी लिमिटेड को 2917 करोड़, यूनाइडेट इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1914 करोड़ और ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 1691 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यही नहीं सरकारी नियंत्रण वाली 173 कंपनियों में से 41 को 2016-17 में 4308 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। मार्च 2017 में देश में 636 सार्वजनिक उपक्रम कंपनियां (सीपीएसई) थीं, जिसमें 438 सरकारी कंपनियों के तौर पर सूचीबद्ध थी और छह वैधानिक निकाय और 192 कंपनियां अन्य तरह के सरकारी नियंत्रण में थीं। इनमें कुछ ही कंपनियां आर्थिक रूप से इस हालत में हैं कि वो सरकार को फायदा दे सकें। तकरीबन 80 फीसदी की हालत खराब है।
सरकारी उपक्रमों की हालत एक दिन में खराब नहीं हुई है। मोदी सरकार ने अपने नाम के चक्कर में सही दिशा में चल रही नीतियों से छेड़छाड़ की, जिसका नतीजा यह हुआ कि सुधार के बजाय हम बर्बादी की राह चल दिए। बीएसएनएल के पास इतनी संपत्ति है कि वह एक धनी सार्वजनिक कंपनी है। सरकार ने उसे आगे बढ़ाने के बजाय निजी टेलीकाम कंपनियों को बढ़ाया। इस नीति ने बीएसएनएल को बीमारू उद्योग की श्रेणी में ला दिया। एचएएल काम के अभाव में कंगाली से जूझ रहा है। सरकार उसके काम निजी क्षेत्र की कंपनियों से करवा रही है। अब डाक विभाग की हालत पतली है। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आयुध फैक्ट्रियों की हालत भी पतली है। उत्पादों की मांग घटने से ये फैक्ट्रियां भी संकट में पड़ गई हैं। हमारी सरकार आयुध उत्पाद अपने यहां विकसित कराने के बजाय विदेशी कंपनियों से निर्यात पर अधिक भरोसा कर रही है। मोदी सरकार के रक्षा क्षेत्र में भारी विदेशी खरीद के फैसले ने घरेलू रक्षा उत्पादों की रीढ़ तोड़ दी। रक्षा या दूसरे क्षत्रों के जो उत्पाद हम अपने उद्योगों में विकसित कर बना सकते थे, उन्हें भी हम आगे नहीं बढ़ा पाये। कंपनियों में काम न होने उनका भविष्य संकट में फंस गया है।
मोदी सरकार लाने के लिए देशवासियों ने उत्साह से मतदान किया था, जिससे वे सकारात्मक बदलाव लायें। पिछली सरकारों की कमियों का रोना रोने के बजाय सही दिशा में अच्छी पारदर्शी नीति से काम करें। बीमार सार्वजनिक उद्योगों और उपक्रमों को प्रोफेसनल्स की मदद से रोगमुक्त बनाकर मजबूती से खड़ा करें। इन संस्थाओं की संपत्तियों को बेचने के बजाय उनका व्यवसायिक इस्तेमाल कर आमदनी बढ़ायें। दुखद यह है कि सरकार ने इन मूल समस्याओं के समाधान के लिए काम करने के बजाय सिर्फ अपनी ब्रांडिंग पर जोर दिया। नीतियां रचनात्मक बनाने के बजाय संकटकारक बनाई गईं। सुधार के नाम पर जो कदम उठाये गये, वो हमारी अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए घातक सिद्ध हुए। शोध की दिशा में काम नहीं हो पाया। जो उच्च शोध संस्थान हैं, वहां के विज्ञानी सिर्फ अपनी नौकरी बचाने में जुटे हैं क्योंकि सरकार की असफलताएं उनके सिर मढ़ी जा रही हैं। युवाओं को रोजगार देने के नाम पर जो भी योजनायें बनाई गईं, असल में वो न युवाओं को सुयोग्य रोजगार दे सकीं और न उन्हें उसके लिए उपयुक्त माहौल। सरकार पर निगरानी करने वाली संस्थाओं को मारा जा रहा है।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ससटेनेबल इम्पलॉयमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के फैसले से देश के 50 लाख लोगों का रोजगार छिन गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर साल 50 लाख व्यवसायिक शिक्षित युवा बेरोजगारों की फौज में जुड़ रहे हैं। कृषि क्षेत्र में जरूरत से 70 गुणा अधिक लोग काम करते हैं। मनमानी तरीके से लागू किये गये जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र के दो करोड़ लोगों को बर्बादी के रास्ते खड़ा कर दिया है। इतना सब होने के बाद भी सरकार सुधार के कदम उठाने के बजाय देश की भीड़ को नकारात्मक दिशा दिखा रही है। जो देश के भविष्य के लिए खतरनाक होगा। सरकार को इन खतरों से निपटने के लिए सही और योजनागत राह अपनानी होगी, जिससे नियोजित तरीके से न केवल बीमारू उद्योगों को सेहतमंद बनाया जा सके बल्कि रोजगार के नये अवसर पैदा किये जा सकें। हमें कॉरपोरेट के मायाजाल से निपटने की सरकारी नीति भी बनानी होगी। इसके लिए नागरिकों की मांग के मुताबिक सशक्त सार्वजनिक उपक्रम तैयार करने होंगे। हमारे देश में न योग्य युवाओं की कमी है और न ही संस्थानों की।
सत्तारूढ़ दल की यह महती जिम्मेदारी है कि वह सभी के लिए समान योग्य व्यवस्था बनाये। संस्थानों को कमजोर करने के बजाय उन्हें मजबूत करे। उद्योगों और उद्यमियों के लिए सुखद माहौल तैयार करे, जिससे रोजगार के भरपूर अवसर मिलें। सरकार बेहतरीन शिक्षा और प्रशिक्षण के संस्थान सांकेतिक फीस पर उपलब्ध कराये। महिलाओं-बच्चों के लिए मित्रवत माहौल बने। किसानों की लागत शून्य की जाये और उनकी उपज की इतनी कीमत मिले, जिससे वो भी खुशहाली में जीवन जी सकें। असंगठित क्षेत्र के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा और काम के अवसर उपलब्ध हों। जब तक आम नागरिक को बेहतर जीवन की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक संविधान की कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पूर्ण नहीं होगी। दुख तब होता है, जब हम देखते हैं कि सरकारें उस दिशा में काम करने के बजाय कुछ समूहों के हित में काम करती हैं। ऐसे समूहों को फायदा पहुंचाने के लिए जनता को बर्बादी की राह में ढकेलती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि अगर हमारे नीति नियंता कुछ नया नहीं बना सकते तो उन्हें बर्बाद करने का हक तो बिल्कुल नहीं है, क्योंकि वे मालिक नहीं हमारे प्रतिनिधि हैं। जिन संस्थाओं और उद्योगों से हमारे देश और देशवासियों को शक्ति मिलती है उनकी संरक्षा करना उनकी महती जिम्मेदारी है।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Analysis of Parliamentary Hot Seat Mainpuri by Ajay Shukla: हॉट सीट मैनपुरी संसदीय सीट का विश्लेषण-अजय शुक्ल: गूंजता है नेताजी का नाम

मैनपुरी में हर कोई नेताजी (मुलायम सिंह) की रैली में मायावती के संबोधन को सुनना चाहता था। ऐसा पहली बार हुआ है। नेताजी की धरती पर मायावती के सद्भावनापूर्ण भाषण ने चुनावी फसल को सोने की फसल बना दिया है। यह संसदीय सीट मुलायम सिंह के अलावा किसी की लहर को नहीं पहचानती। ऐसे में मायावती के अखिलेश और मुलायम के साथ मंच पर आने मात्र से चुनाव ने करवट ले ली। यही नहीं माया ने मुलायम सिंह को हाथ जोड़कर जब अभिवादन किया तो जनता भावविभोर हो गई। निश्चित रूप से इस रैली का असर आने वाले बाकी के पांच चरणों के चुनाव में दिखना तय है। माना जा सकता है कि यूपी की सियासत में मैनपुरी एक बदलाव लाने जा रहा है क्योंकि जो भ्रम इस रैली के पहले तक नेताजी को लेकर था, उस पर अब विराम लग गया। देश के पहले आमचुनाव 1952 में यहां से कांग्रेस के बादशाह गुप्ता सांसद बने। उसके बाद यह सीट दूसरे चुनाव 1957 में बदलाव का कारक बनी और यहां से समाजवादी बंसीदास धनगर सांसद बने। 1962 में फिर कांग्रेस के बादशाह गुप्ता और 1967 तथा 1971 में कांग्रेस के महाराज सिंह और 1984 में इंदिरा गांधी के शोक की लहर में बलराम सिंह यादव जीते। 1977 में यह सीट भारतीय लोकदल रघुनाथ सिंह वर्मा ने जीती जो 1980 में जनता पार्टी सेकुलर से दोबारा जीते। 1989 में जनतादल की लहर में यह सीट उदय प्रताप सिंह के पास पहुंच गई, जो 1991 में जनता पार्टी से फिर जीते। 1996 में इस सीट पर मुलायम सिंह यादव आये जिनके नाम पर यह सीट चलने लगी। 1998 और 1999 में बलराम सिंह यादव ने मुलायम के सिपाही के तौर पर चुनाव जीता। 2004 में एक बार फिर मुलायम इस सीट पर लौटे मगर उन्होंने अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव के लिए सीट छोड़ दी। 2009 और 2014 में फिर मुलायम यहां से सांसद बने। 2014 में यह सीट मुलायम ने अपने पोते तेज प्रताप सिंह यादव के लिए छोड़ दी। इस बार फिर मुलायम इस सीट पर लौटे हैं। माना जा रहा है कि यह उनका आखिरी चुनाव है।
मैनपुरी जिले की सभी विधानसभा सीटों पर भी मुलायम का नाम चलता रहा है मगर 2017 में अखिलेश मुलायम की रार में लोगों ने अखिलेश के प्रति नाराजगी दिखाई थी। शुक्रवार की मुलायम-माया और अखिलेश की रैली के बाद कोई संशय नहीं रह गया मैनपुरी क्षेत्र असल में नेताजी के भाई पूर्वमंत्री शिवपाल सिंह यादव की कर्मभूमि के तौर पर देखा जाता रहा है। इसी संसदीय सीट क्षेत्र में शिवपाल का विधानसभा क्षेत्र जसवंतनगर आता है। यहां के लोगों में एक भ्रम था कि शिवपाल के समर्थन में और अखिलेश के विरोध में नेताजी मायावती के साथ नहीं आएंगे मगर यह भ्रम टूटने से हालात बिल्कुल बदल गये हैं।
2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट पर 16 लाख से अधिक मतदाता थे। जातीय समीकरण के अनुसार यह सीट यादव बाहुल्य है, जो करीब 35 फीसदी है। करीब साढ़े तीन लाख मतदाता दलित समुदाय से है। ढाई लाख मतदाता शाक्य बिरादरी से है। एक-एक लाख क्षत्रिय और मुस्लिम मतदाता हैं। सवा लाख के करीब ब्राह्मण और इतने ही वैश्य समुदाय के मतदाता हैं। बाकी मतदाता भी तमाम पिछड़ी जातियों के हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभाएं हैं, मैनपुरी, भोगांव, किशनी, करहल और जसवंतनगर। 2017 के चुनाव में जसवंतनगर सपा के शिवपाल यादव को मिली जबकि भोगांव भाजपा और शेष तीनों भी सपा के खाते में गई थी। मोदी लहर में भी तेजप्रताप सिंह यादव ने यहां 65 फीसदी वोट हासिल किये थे। उस वक्त यहां कुल 62 फीसदी मतदान हुआ था। शुक्रवार को हालात यह थे कि रैली स्थल से 10 किमी पहले वाहनों को रोक दिया गया था मगर मुलायम-माया के समर्थक धूप-गर्मी की परवाह किये बगैर यहां पैदल दौड़े आये थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मैनपुरी वासियों के मुलायम के अलावा कुछ नहीं चाहिए। माया-मुलायम की यह रैली यूपी की सियासत में एक बड़े बदलाव का कारक बनने जा रही है। कभी डकैत छविराम, निर्भय गुर्जर, मानसिंह जैसे डकैतों की की धरती रहा मैनपुरी अब बदल रहा है। वहां के युवा विकास की बात करते हैं। ऐसे दौर में उन्हें अपने नेता मुलायम सिंह और मायावती ही नजर आते हैं। मुलायम ने यहां सभी बिरादरियों में पकड़ बनाई है। जो वोट मुलायम से कटता था, वो भी माया के आने से एकजुट हो जाएगा। और हां मुलायम और माया के एक साथ आने पर वह पुराना नारा भी फिर से दोहराया जाने लगा है, मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।

Analysis of Hot Seat Lucknow by Ajay Shukla: हॉट सीट लखनऊ का विश्लेषण- अजय शुक्ल: राजनाथ के व्यक्तित्व के आगे विपक्ष धूमिल

देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लखनऊ संसदीय सीट से दोबारा नामांकन किया है। ‘लीडरशिप’ की गुणवत्ता से भरपूर राजनाथ सिंह को यह सीट अटल की विरासत के रूप में मिली थी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कई बार की हार के बाद राममंदिर लहर में 1991 में पहली बार यह सीट हासिल की थी। उसके बाद यह सीट उनकी ही होकर रह गई। राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री के रूप में अटल बिहारी की पसंद थे। कल्याण सिंह से तल्खी के बाद अटल ने राजनाथ को मजबूत किया। मुख्यमंत्री बनने के पहले तक राजनाथ सिंह कभी कोई चुनाव नहीं जीते थे। वह सदैव बैकडोर इंट्री के जरिए ही सदन के सदस्य बनते रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद राजनाथ के लिए कांग्रेसी नेता सुरेंद्रनाथ अवस्थी उर्फ पुत्तू अवस्थी ने हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से इस्तीफा दे दिया था। पुत्तू ने वहां से राजनाथ को लड़ाकर पहली बार विधानसभा का सदस्य बनवाया था। अटल बिहारी के मंत्रिमंडल में भी राजनाथ को राज्यसभा के रास्ते शामिल किया गया था।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने वाले राजनाथ सिंह ही नरेंद्र मोदी के चाणक्य बने। उन्होंने मोदी को वाराणसी संसदीय क्षेत्र से उतारकर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। राजनाथ का व्यक्तित्व इतना विशाल रहा है कि उनके आगे विपक्षी भी फीके पड़ जाते थे। उनका व्यक्तित्व सरदार पटेल के मानिंद दिखता रहा है। इसका नतीजा यह रहा कि कभी भी विरोधी दल के नेता भी उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाये। यूपी के शिक्षा मंत्री रहते उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव किया था। मुख्यमंत्री के रूप में सशक्त प्रशासक की भूमिका में नजर आये और अटल बिहारी के मंत्रिमंडल में रहते हुए उनकी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए लोगों को बेहतरीन सड़कों पर सरपट दौड़ाने का काम किया। शायद यही वजह रही कि मंगलवार को जब राजनाथ का काफिला नामांकन के लिए निकला तो हर तरफ एक ही आवाज थी, राजनाथ, फिर राजनाथ। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सीट को भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक कर्मभूमि माना जाता रहा है।
लखनऊ संसदीय सीट पर कुल 16 बार लोकसभा चुनाव हुए, इनमें सात बार भाजपा, छह बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। इसके अलावा भारतीय लोकदल, जनता दल और निर्दलीय ने एक-एक बार जीत दर्ज की है। कभी इस सीट की पहचान 1977 तक नेहरू परिवार की विरासत के रूप में थी। शिवराजवती नेहरू यहां की पहली सांसद थीं और उन्होंने 1952 में अटल बिहारी को बुरी तरह हराया था। उनके बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित सांसद बनीं। 1957 में कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी ने अटल बिहारी को हराया और 1962 में कांग्रेस के बीके धवन यहां से सांसद बने। लखनऊ सीट का इतिहास सदैव लहर के साथ रहा। पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1967 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई थीं। उनकी पार्टी से टूटे तमाम दल और नेता उनके लिए दीवार बन रहे थे। कांग्रेस ने यहां से उद्योगपति कर्नल वीरआर मोहन को उतारा तो उनको निर्दलीय प्रत्याशी मशहूर शायर पूर्व जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने उन्हें हरा दिया। पंडित आनंद नारायण मुल्ला के बाद कोई भी निर्दलीय इस सीट को नहीं जीत सका। 1971 में इंदिरा गांधी की मामी शीला कौल ने लखनऊ में जीत दर्ज कराई। इंदिरा गांधी के खास होने के कारण मुख्यमंत्री रहे हेमंतीनंदन बहुगुणा 1977 में उन्हें धोखा दे गये और इंदिरा विरोधी लहर का फायदा उठाकर लखनऊ सीट पर भारतीय लोकदल से सांसद बने। 1980 और 1984 में यह सीट फिर से कांग्रेस की शीला कौल के हाथ आई। 1989 में जनता दल की लहर में यहां से शिक्षक नेता मांधाता सिंह ने कांग्रेस के दाऊजी को हराकर सीट कब्जाई।
1991 में कांग्रेस के रणजीत सिंह को हराकर अटल बिहारी बाजपेई पहली बार इस सीट से जीते। यह उनका गढ़ बन गया। पिछले 28 सालों में अटल के इस किले को कोई भी सियासी दल भेद नहीं सका है। पार्षद से लेकर महापौर और विधायक का चुनाव हो या फिर सांसद का, सबमें भाजपा हावी रही। अटल की तैयार की गयी जमीन पर तब से भाजपा फसल काट रही है। 2009 में सांसद प्रतिनिधि रहे लालजी टंडन इस सीट पर अटल जी की चिट्ठी लेकर जीते। 2014 के चुनाव में भी अटल की चिट्ठी चली और राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी की जीत के सभी रिकार्ड तोड़ते हुए नया रिकार्ड बनाया। कांग्रेस की रीता जोशी बहुगुणा को दो लाख 88 हजार वोट से ही संतोष करना पड़ा। सपा के आंकड़े 50 हजार के आंकड़े पर सिमट गये।
राजनाथ का कद बढ़ गया है कि नामांकन की तारीख निकल रही है मगर कांग्रेस, सपा-बसपा सहित कोई भी विरोधी दल उनके खिलाफ मंगलवार तक प्रत्याशी तक नहीं खोज पाया है। भाजपा के मीडिया प्रभारी मनीष दीक्षित और पूर्व महानगर उपाध्यक्ष मनीष शुक्ल कहते हैं कि इस सीट पर राजनाथ को चुनौती देने वाला कोई नेता किसी दल में नहीं है। लखनऊ का सबसे बड़ा वोटबैंक ब्राह्मण है जो राजनाथ के साथ है।

Factual logical knowledge is required for general public benefit: सर्वजनहिताय के लिए तथ्यपूर्ण तार्किक ज्ञान आवश्यक

रात हमारे एक व्यवसायी मित्र का घर आना हुआ। हम कुछ लिख रहे थे, सामने न्यूज चैनल चल रहा था। शिष्टाचारवश हमने चाय-पानी प्रस्तुत किया। हमारे एक अन्य मित्र इलाहाबाद से आए हुए थे। न्यूज चैनल्स देखकर अनायास सियासी चर्चाएं होने लगीं। हमारे व्यवसायी मित्र ने भी दूसरे अन्य मूर्खों की तरह कहना शुरू किया कि आखिर पिछले 70 सालों में देश में क्या हुआ है? नेहरू ने देश के लिए क्या किया, देश का बंटवारा करा दिया? चरित्र से लेकर न जाने कौन-कौन सी कहानियां सुना दीं। हम अचंभित थे, कि क्या भारत की युवा पीढ़ी इतनी ज्ञानहीन है, कि बगैर इतिहास-भूगोल, अर्थशास्त्र जाने-समझे चर्चा करती है। यही नहीं वे अपनी सोच दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। तकलीफ हुई कि किस तरह का ज्ञान बांटा जा रहा है। हमने आग्रह किया कि रट लगाने के बजाय तथ्यों पर गौर करें। कुछ पढ़ लिया करें, तो शायद इस तरह के सवाल न उपजेंगे। कोई भी मूर्ख नहीं बना पाएगा। बहराल, यह उन व्यवसायी मित्र की ही नहीं बल्कि देश के बड़े युवा वर्ग की समस्या है। यह वर्ग सोशल मीडिया और गूगल से मिले ज्ञान पर चर्चा करता है तो उससे उम्मीद भी और क्या की जा सकती है।
हमने मित्र से आग्रह किया कि देश के बंटवारे को लेकर चर्चा से पहले 22-23 मार्च 1940 को लाहौर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन के अलग मुस्लिम रियासत के प्रस्ताव को पढ़ लेते। प्रस्ताव में भारत के मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान की नींव रखी गई। तभी हर साल पाकिस्तान में 23 मार्च को ‘यौमे पाकिस्तान’ के रूप में मनाया जाता है। प्रतिक्रिया स्वरूप विनायक दामोदर सावरकर की अध्यक्षता में पाकिस्तान का विरोध करते हुए हिंदुस्तान बनाने का प्रस्ताव पढ़ा गया। 15 अगस्त, 1943 को नागपुर में सावरकर ने कहा था, ‘मिस्टर जिन्ना की टू नेशन थ्योरी से मेरा कोई विवाद नहीं है। हम, हिंदू, स्वयं में एक राष्ट्र हैं। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं।’ जब महत्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो पूरे देश में उसे समर्थन मिला मगर सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा ने अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया था। अगर आपने यह सब पढ़ लिया होता तो शायद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपिता के रूप में विभूषित महात्मा गांधी को दोषी न ठहराते। ब्रिटिश संसद में पास हुए इंडियन इंडिपेंडेंट एक्ट 1947 को पढ़ लेते तो शायद कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को न कोसते। ब्रिटेन के विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ ने माना था कि कश्मीर विवाद ब्रिटेन के औपनिवेशिक अतीत के कारण पैदा हुआ था। भारत की स्वतंत्रता के समय ब्रिटेन सरकार ने ढुलमुल रवैया अपनाया था। राजा हरि सिंह ने तब भारत में विलय के प्रस्ताव ‘इंस्ट्रूमेंट आॅफ एक्सेशन’ पर 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षर किए जब पाकिस्तान पोषित कबीलाई हमला हुआ। जिसे तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटेन ने देर रात मंजूरी भी दे दी थी। भारतीय सेनाओं ने कश्मीर पर कब्जा ले लिया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इस पर विस्तृत साक्ष्यों के साथ तमाम सवालों के जवाब दिए हैं। हमने अपने मित्र से उन फोटो पर भी चर्चा की जिन्हें दिखाकर पंडित नेहरू का चरित्रहनन किया जाता है। उनमें एक फोटो उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित और दूसरी उनकी भांजी नयनतारा सहगल के साथ की है।
हमें इस बात से कोई आपत्ति नहीं कि कोई किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से संबंधित रहे। यह चयन हर व्यक्ति का अधिकार है। हमारे परिवार में मां-पिता एक विचारधारा से संबंधित हैं, और भाई दूसरी से। यहां तक कि कई बार हमारे विचार से पत्नी भी असहमत होती है। हमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि यही लोकतंत्र के गुलदस्ते की खूबी है। हर किसी को अपने विचार स्वतंत्रता से रखने चाहिए। किसी को भी किसी दूसरे के ऊपर अपने विचार नहीं थोपने चाहिए। दुख तब होता है, जब खुद को पढ़ा लिखा और योग्य बताने वाले अपनी विचारधारा को सही सिद्ध करने के लिए मनगढ़ंत कहानियां सुनाते हैं। किसी का भी चरित्रहनन करते हैं। महान चरित्र या नेता को अयोग्य और समस्याओं का कारक मानते हैं। यदि हम किसी की समीक्षा करें तो हर पहलू, तथ्य, इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र का तर्कपूर्ण विवरण होना चाहिए। इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान के लिए पढ़ना पड़ेगा, जो हमारी युवा पीढ़ी नहीं कर रही है। यह पीढ़ी अपने उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है मगर उसके लिए उतने यत्न नहीं करना चाहती है। हर कोई तुरंत सबकुछ पा लेना चाहता है। यही समस्या है। इसी क्रम में युवाओं ने ज्ञान के लिए पढ़ने के बजाय सिर्फ अच्छे नतीजे के लिए स्ट्रेटिजिकल पढ़ाई पर जोर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि उनके पास डिग्री हो सकती है मगर ज्ञान का अभाव है।
इस वक्त देश का सबसे बड़ा मतदाता युवा वर्ग का है। करीब 84 करोड़ मतदाताओं में 53 फीसदी 40 वर्ष से कम उम्र के हैं। इससे तय है कि देश के भविष्य का फैसला उनके हाथ है। सवाल यह उठता है कि अगर यही वर्ग अज्ञानता का शिकार होकर भ्रमित रहेगा तो सही फैसले कैसे कर सकेगा। ऐसी स्थिति में वो सोशल मीडिया और स्वार्थ ग्रसित सियासी दलों के भ्रमजाल में फंस जाएगा। यह पीढ़ी गलत प्रचार का हिस्सा बन जाएगी। हमें अपने इन युवाओं को पढ़ने और तथ्यों पर तर्कपूर्ण चर्चा के लिए तैयार करना होगा। हमारे धर्म में ज्ञान के महत्व को बताया गया है। वेदांग के ब्रह्मसूत्र में लिखा है ‘अथातो ब्रम्ह जिज्ञासा’ अर्थात ज्ञानार्जन की जिज्ञासा ही ब्रह्म है। हमें बगैर पूर्ण ज्ञान के किसी का चरित्र हनन करने या लांछन लगाने का हक नहीं है। अगर कोई किसी को लांछित करता है, तो उसे साबित करने का भार भी उसी पर होता है। हालांकि इन दिनों इन मर्यादाओं पर अधिकतर लोग गौर नहीं करना चाहते हैं। उनके लिए सिर्फ अपना सियासी या वैचारिक मत ही महत्व रखता है। यह सोच भविष्य के लिए घातक है।
देश का युवा बेरोजगारी की भीड़ का हिस्सा है। बेरोजगारी कम होने के बजाय पिछले सालों में बहुत अधिक बढ़ी है। इसके लिए मौजूदा सरकार की अर्थनीति के साथ ही सरकार में रोजगार परक नीति न होना और नोटबंदी जैसी वजहें हैं। बेरोजगारों की यह बढ़ती फौज निश्चित रूप से देश को गर्त में ले जाने वाली है। ज्ञान का अभाव और काम न होने पर युवा गलत राह अख्तियार कर रहा है। जो देश, समाज और परिवार के साथ ही खुद उसके लिए भी घातक है। हमें निष्पक्ष और ज्ञान के आधार पर तर्कपूर्ण समाज का हिस्सा बनना होगा। समाज में फैल रही बुराइयों को खत्म करने के और सरकारों को अपने नागरिकों के हित में फैसले लेने के लिए हम तभी बाध्य कर सकेंगे जब हम जागरूक और ज्ञानवान होंगे।
जय हिंद।

अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Analysis of Hot Seat RaeBareli by Ajay Shukla: हॉट सीट रायबरेली का विश्लेषण:अजय शुक्ल: फिरोज से सोनिया तक, गांधी-नेहरू परिवार ही पहली पसंद

रायबरेली सीट का जिक्र आते ही हमें गांधी-नेहरू परिवार की याद ताजा हो जाती है। फिरोज जहांगीर गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक इस सीट पर अब तक सिर्फ एक बार गांधी परिवार को हार का मुंह देखना पड़ा जब 1977 में समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा विरोधी लहर में जीत दर्ज कराई थी। रायबरेली अब तक इसे अपनी ऐतिहासिक भूल मानती है। गांधी परिवार की अनुपस्थिति के चलते 1996 और 1998 में कांग्रेस को यहां हार का मुंह देखना पड़ा था। भले ही उत्तर प्रदेश में पिछले 30 सालों से कांग्रेस सत्ता में नहीं है मगर कांग्रेस की सरकार और उसके सांसदों ने रायबरेली को भरपूर दिया है। यहां राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर के इतने संस्थान तथा उद्योग लगे, जितने कहीं और नहीं लगे। यहां के लोगों को सिंचाई और सड़क से लेकर रेल तक की इतनी हर सुविधा दी गई। गांवों में सड़कों का जाल बिछा। उद्योग धंधों के साथ ही शहर भी चमका मगर राज्य में सत्ता न होने के चलते तमाम योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल सका जितना मिल सकता था। यही कारण है कि रायबरेली के बाशिंदे गांधी परिवार के अलावा किसी पर यकीन नहीं करते।

देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू के दामाद अंग्रेजी के प्रख्यात पत्रकार फिरोज जहांगीर गांधी पहली बार 1952 में इस सीट से सांसद बने। उस वक्त यह सीट रायबरेली प्रतापगढ़ कहलाती थी और दो सांसद होते थे। दूसरे सांसद कांग्रेस के बैजनाथ कुरील बने। उस वक्त अमेठी भी इसी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था। 1957 में यह संसदीय सीट पूर्ण अस्तित्व में आई तब फिर से फिरोजगांधी यहां से चुने गये। 1960 में उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद कांग्रेस के आरपी सिंह सांसद बने। 1962 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर बैजनाथ कुरील फिर से सांसद बने। लाल बहादुर शास्त्री ने जब इंदिरा गांधी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया तो उनका कद बढ़ा और फिर जब वह देश की प्रधानमंत्री चुनी गईं तो उन्होंने 1967 के चुनाव में इस सीट पर जीत दर्ज कराई। प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र बनते ही यह अति पिछड़ा क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे निकलने लगा। 1971 में इंदिरा गांधी ने रिकार्ड जीत दर्ज कराई मगर 1977 में उन्हें आपातकाल का खामियाजा भुगतना पड़ा और समाजवादी नेता राजनारायण ने उन्हें पराजित किया। हालांकि 1980 के चुनाव में रायबरेली की जनता ने उनसे माफी मांगी और पुनः सांसद बनाया मगर जीतने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद अरुण नेहरू 1981 और 1984 में सांसद बने। उनके बाद 1989 और 1991 में शीला कौल यहां से सांसद बनीं मगर उन्होंने क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया। नतीजतन 1996 और 1998 में यहां से भाजपा के अशोक सिंह जीते। 1999 में सोनिया के लिए अमेठी सीट छोड़कर रायबरेली पहुंचे कांग्रेस के सतीश शर्मा ने भाजपा के अरुण नेहरू को पटखनी दी। 2004 से 2014 तक सोनिया गांधी ने यहां से चार चुनाव जीते। गुरुवार को उन्होंने 5वीं बार यहां से अपना नामांकन दाखिल किया है।

गांधी परिवार रायबरेली के विकास को लेकर सदैव संजीदा रहा। यहां पांच विधानसभा सीटें बछरावां, हरचन्दपुर, रायबरेली, सरेनी और ऊंचाहर हैं। 1989 तक राज्य में कांग्रेस सरकार होने के कारण विकास की गाड़ी बड़ी तेजी से दौड़ी मगर उसके बाद यूपी में कांग्रेसी सत्ता न होने के कारण यूपी की सत्ता में काबिज रही सपा, बसपा और भाजपा सरकारों से कुछ नहीं मिल सका। केंद्र में कांग्रेस की सरकार रहते केंद्रीय योजनाओं की यहां झड़ी लगती रही। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक ने रायबरेली क्षेत्र को बहुत कुछ दिया। केंद्र सरकार की इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज मुख्य है। ऊंचाहार का पावर प्लांट हो या बेहता ब्रिज, इंदिरा गार्डन, डलमऊ, समसपुर बर्ड सेंचुरी सभी कांग्रेस की ही देन हैं। इसके अलावा एनटीपीसी, सीमेंट फैक्ट्री, रेल कोच फैक्ट्री, आईटीआई जैसी तमाम इकाइयां और उद्योग लगाकर कांग्रेस ने रायबरेली के लोगों को रोजगार दिया था। फुरसतगंज में हवाईपट्टी तो है ही, विमान प्रशिक्षण स्कूल भी है। रायबरेली में राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट जैसा उच्चस्तरीय संस्थान इस इलाके पर गांधी परिवार के प्रभुत्व को दर्शाने के लिए काफी है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन डिजाइनिंग और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फार्माच्युटिकल जैसे संस्थान सोनिया गांधी लेकर आईं। रेल कोच फैक्ट्री की नीव रखी और आईआईटी का सेटर भी यहां स्थापित किया। एम्स की ओपीडी भी शुरू हुई थी मगर भाजपा सरकार में नाइपर, एम्स और आईआईटी के सेंटर यहां से दूसरे स्थानों में ट्रांसफर कर दिये गये। स्थानीय लोगों का कहना है कि कांग्रेस ने रायबरेली को दिया मगर भाजपा सहित अन्य दलों ने उन परियोजनाओं को छीनने का काम किया है।
इन हालात पर चर्चा करते हुए पूर्व विधायक अखिलेश सिंह कहते हैं कि रायबरेली गांधी-नेहरू परिवार की अहसानमंद है और जनता उनका साथ नहीं छोड़ने वाली। सोनिया गांधी के खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी विधायक डीपी सिंह हैं। डीपी सिंह भी रायबरेली में हुए कामों को लेकर कांग्रेस के दावे पर मोहर लगाते हैं मगर कहते हैं कि उनके लगाये आधे से अधिक उद्योग बंद हो चुके हैं। हम उन्हें चलवाने का काम करेंगे जिससे एक बार फिर से रायबरेली के लोगों को रोजगार मिल सके। कांग्रेस नेता कहते हैं कि कांग्रेस ने उद्योग लगवाये थे मगर विरोधी दलों ने उन्हें बंद करवाने का काम किया।

Hot Seat Analysis of Amethi by Ajay Shukla: हॉट सीट अमेठी का विश्लेषण: अजय शुक्ल: न मोदी लहर न स्मृति का जलवा.. राहुल से गुस्सा मगर दिल में जगह

जहां बंजर पड़ी जमीनें हों और पानी के लिए मीलों चक्कर लगाते लोग। न उद्योग धंधे दिखें और न कोई कारोबार, समझ लो आप अमेठी क्षेत्र में हैं। 1975 तक अमेठी क्षेत्र की यही पहचान थी। अमेठी की जनता 1967 और 1971 के चुनाव में यहां से कांग्रेस के पंडित विद्याधर बाजपेई को जिता चुकी थी। देश में आपात काल की घोषणा हुई और संजय गांधी ने अमेठी संसदीय क्षेत्र को अपनाने का फैसला किया। उन्होंने वहां के एक पिछड़े गांव में श्रमदान के साथ सक्रियता बढ़ाई मगर जब 1977 का लोकसभा चुनाव हुआ तो वहां की जनता ने उन्हें नकार दिया। पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। 1980 में संजय गांधी रिकार्ड मतों से जीते। संजय गांधी की जीत के साथ ही अमेठी का भविष्य बदलना शुरू हो गया। सार्वजनिक और निजी कंपनियों ने यहां उद्योग लगाने शुरू किए। तभी संजय की हवाई दुर्घटना में असमय मृत्यु हो गई। जनता ने 1981 में राजीव गांधी को चुना और फिर 1984, 1989 तथा 1991 में सांसद चुना मगर उनकी भी आतंकी घटना में मृत्यु हो गई। विकास का पहिया चल चुका था और अमेठी को औद्योगिक इकाइयों के साथ ही सड़कों, नहरों का जाल मिलने लगा था। मृदा परीक्षण करके जमीनों को उपजाऊ बनाने का भी काम शुरू हो गया था, जिससे यह फसली क्षेत्र बन गया।

राजीव गांधी की मृत्यु के बाद उनके मित्र सतीश शर्मा जीते और मंत्री बने तो उन्होंने विकास के रथ को आगे बढ़ाया। 1998 में अमेठी के राजा संजय सिंह ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा और सतीश शर्मा को हराकर संसद पहुंच गए मगर 1999 में सोनिया गांधी ने उन्हें बुरी तरह हराया और पहली बार संसद पहुंची। इसके बाद 2004, 2009 और 2014 सभी चुनावों में यहां की जनता ने राहुल गांधी को चुना। 2014 में राहुल का भाजपा की स्मृति ईरानी से कड़ा मुकाबला हुआ मगर राहुल ने मोदी लहर के बावजूद उन्हें पटखनी दी। स्मृति को राहुल गांधी से चित होने के बाद भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। स्मृति ने हार के बाद भी राहुल और अमेठी का पीछा नहीं छोड़ा, हालांकि राहुल ने उन्हें कोई महत्व नहीं दिया। कुल मिलाकर यह बात साफ है कि इस सीट ने कभी कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा। दो बार यहां कांग्रेस हारी मगर दोनों ही नेता कांग्रेस से दूसरे दलों में गए थे। यहां के लोग राहुल से गुस्सा हैं कि वे अपने माता-पिता की तरह उनके दुख दर्द बंटाने नहीं आते। उनसे मिलते भी नहीं हैं मगर दिल में जगह अभी भी है।

इस बार अमेठी सीट पर काफी कड़ा मुकाबला दिख रहा है। स्मृति ईरानी और भाजपा प्रचार करते हैं कि अमेठी में कांग्रेस ने कुछ नहीं किया जबकि यहां के लोग और वस्तुस्थिति उनके दावे को नकारते हैं। यहां के लोग कहते हैं कि अब तक अमेठी में जो हुआ, वो कांग्रेस ने ही किया। अमेठी को एक पहचान दी। हालांकि लोगों का कहना है कि जब तक राजीव गांधी थे, अमेठी का भरपूर विकास हुआ। राजीव गांधी के साथ ही यूपी में कांग्रेस भी चली गई और केंद्र से बहुत कुछ नहीं मिल पाया। राहुल गांधी यहां वक्त भी नहीं देते हैं। अमेठी राजेंद्र भइया कहते हैं कि हिन्दुस्तान एरोनॉटिकल (एचएएल) की इकाई, इंडोगल्फ फर्टिलाइजर्स, बीएचईएल प्लांट, इंडियन आॅयल की यूनिट, पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान के अलावा तमाम शैक्षणिक और तकनीकी संस्थान कांग्रेस ने ही दिए थे। अमेठी-रायबरेली वीआईपी क्षेत्र बना जिसके कारण फुरसतगंज में हवाई पट्टी और विमान प्रशिक्षण स्कूल भी बना है। शुकुल बाजार के निवासी बब्बन दुबे कहते हैं, मेगा फूड पार्क, हिंदुस्तान पेपर मिल, आईआईआईटी, होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, गौरीगंज में बनने वाला सैनिक स्कूल जैसे प्रोजेक्ट भाजपा सरकार में या तो कहीं और भेज दिए गए या फिर रोक दिए गए हैं। भाजपा की यूपी और केंद्र दोनों में सरकारें रही हैं मगर उन्होंने तो झूठ बोलने के अलावा कुछ नहीं किया।

Sankalp patra Analysis: Ajay Shukla: संकल्प पत्र विश्लेषण : अजय शुक्ल, सेना के पराक्रम से राष्ट्रवाद को भुनाता संकल्प पत्र

भाजपा के संकल्प पत्र पर विश्लेषण:

चंडीगढ़। 17वीं लोकसभा के निर्वाचन के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा पत्र (संकल्प पत्र 2019) सोमवार को जारी कर दिया। 16वीं लोकसभा के चुनाव के लिए 2014 में 08 अप्रैल को ही घोषणा पत्र जारी किया गया था। उस वक्त 52 पेज के घोषणा पत्र में 549 वादे किये गये थे। इस बार 50 पेज के संकल्प पत्र में 208 वादे हैं, जिनमें 75 संकल्पों को दोहराया गया है। इसमें किसानों, युवाओं, महिलाओं, रेलवे, स्वास्थ, अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचा, समान विकास, संस्कृतिक धरोहर और सुशासन को शामिल किया गया है। इस संकल्प पत्र में राष्ट्रवाद, अंत्योदय, सुशासन और सांस्कृतिक विरासत के नाम रामंदिर का राग नये तरीके से पेश किया गया है। 2014 के वादे अच्छे दिन लाने के लिए महंगाई कम करना, काले धन लाने, हर साल दो करोड़ रोजगार, हर रोज एक कानून खत्म करने पर कोई चर्चा इस बार नहीं है। कश्मीरी पंडितों के लिए भी भाजपा के पास पुराने राग के सिवाय कुछ नहीं है। कांग्रेस के घोषणा पत्र की काट इसमें नहीं है मगर उसका असर जरूर है।
संकल्प पत्र 2019 के निर्माता देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह हैं जो 2014 के घोषणा पत्र के भी निमार्ता थे। 08 अप्रैल 2014 को जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत करते हुए राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जारी किया था, तब उनके साथ भाजपा के प्रणेता लालकृष्ण आडवाणी और डा. मुरली मनोहर जोशी भी थे। सोमवार को ये दोनों लोग मोदी टीम के साथ नजर नहीं आये। मोदी, राजनाथ, अमित शाह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज सहित सात लोग मंच पर थे। संकल्प पत्र में राष्ट्रवाद की भावना पर सियासत गर्माने की कोशिश की गई है। राष्ट्र सर्वप्रथम शीर्षक से इसकी शुरुआत है। जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, सैन्यबल, सीमा सुरक्षा, वामपंथ से मुकाबला और अनुच्छेद 370 को रखा गया है। ये वही बातें हैं जिन पर राजनीति न करने की बात भाजपा नेता बार-बार कहते रहे हैं। यह भी याद रहे कि ये सभी लच्छेदार वायदे पिछले चुनावों में भी दूसरे शब्दों से शामिल थे।
भाजपा ने कांग्रेस की किसान नीति की अहमियत को समझा है। उसने किसानों की आय दो गुनी करने के पिछले चुनावी वायदे को ही इस बार भी दोहराया है। उसमें गरीब किसानों को वृद्धावस्था पेंशन की बात कही गई है, जो पहले से ही दूसरे रूप में मिल रही है। देश को सुशासन और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के वादे के साथ ही व्यापारियों के हितों को साधने का वादा किया गया है। मेक इन इंडिया से लेकर एमएसएमई सेक्टर की बात की गई है मगर उस पर कोई विजन नहीं दिखा। युवाओं को बेहतर भविष्य देने में असफल रहे स्टार्टअप को फिर दोहराया गया है। शहरी विकास को प्राथमिकता पर रखा गया है मगर 100 नये स्मार्ट सिटी बनाने के पुराने वादे पर कोई चर्चा नहीं है। जल संसाधन मंत्रालय को जल शक्ति में तब्दील करने की बात है जैसे योजना आयोग, नीति आयोग बना था।
संकल्प पत्र में सुशासन और राम मंदिर का राग एक बार फिर से अलापा गया है, जिस पर पिछले घोषणा पत्र में भी वादे किये गये थे। सांस्कृतिक विरासत में रखे गये बिंदुओं में गंगा, सबरीमला, योग, धरोहर दर्शन और भारतीय भाषाओं को शामिल किया गया है। समान नागरिक संहिता को फिर दोहराया गया है। युवाओं और महिलाओं को लेकर वादे हैं मगर पिछले वादे अब तक कागजी हैं। कौशल विकास पर भी दोबारा वादा है मगर पिछले बार के नतीजे उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं। रेलवे से लेकर सेहत तक की बात की गई है मगर पिछले पांच सालों में बदतर हुई हालत के लिए जिम्मेदार कौन है? यह सवाल खड़ा होता है। वैश्विक भारत के नाम पर विदेश नीति को वसुधैव कुटुम्बकम का सिद्धांत बखान किया गया है।
गौर से देखने पर पिछले लोकसभा चुनाव में जारी किये गये घोषणा पत्र से इस संकल्प पत्र में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आता है। चेहरों में कुछ अंतर है मगर कोई ठोस आधार नहीं है। राष्ट्रवाद और सैन्य बलों की क्षमताओं को भुनाने की कोशिश की गई है। भाजपा को यह समझ आ गया है कि देशवासी राष्ट्र और सेनाओं के नाम पर एकजुट हो जाते हैं। विरोधी दल वाजिब विरोध दर्ज कराकर खलनायक बन जाते हैं।

Undignified power will not give anything to the nation : मर्यादाविहीन सत्ता से राष्ट्र को कुछ हासिल नहीं होगा

रामचरितमानस में तुलसीदास ने हर स्थान पर मर्यादा को सबसे अधिक महत्व दिया है। यहां तक कि रामायण के मुख्य पात्र राम हैं, जिन्हें उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है। रामचरितमानस भारतीय समाज में मर्यादाओं के पालन पर जोर देता है। राम के चरित्र में यही विशेषता है जो उन्हें भगवान की तरह खड़ा करती है। राम परिवार, समाज, राजपाठ से लेकर पशु-पक्षियों तक में मर्यादानुकूल कार्य करते दिखते हैं। वह किसी भी हद पर पहुंचने के बाद भी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। हम उस रामराज की स्थापना की बात करते हैं। मगर जब व्यवहार उससे इतर करते हैं तब हमारा दोहरा चरित्र सामने आता है। देश के हालात अनुकूल नहीं हैं। पड़ोसी देशों से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर देश और देशवासी जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें मजबूत आधार और वैश्विक मंच पर विशेष स्थान शोर मचाने से नहीं मिलेगा, बल्कि उसके लिए अपनी संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करना होगा। दुख की बात यह है कि इस तथ्य को कोई समझने को तैयार नहीं है। कौन किससे अधिक संस्कारी दिखाने की होड़ नहीं है, बल्कि कौन किससे अधिक असभ्य है, यह दर्शाया जा रहा है।
हमारे देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति यह हो गई है कि वो संवैधानिक हैं? हमें इस पर यकीन करने के लिए कानून की किताबें और संविधान के अनुच्छेद तलाशने पड़ रहे हैं। हम टीएन शेषन के चुनाव आयोग को याद करते हैं तो लगता है कि इस वक्त का चुनाव आयोग जंगल के कानून से प्रभावित है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। न्यायपालिका हो या फिर किसी अन्य संवैधानिक संस्था सभी की हालत देखकर तरस आता है कि उनका डंडा सिर्फ कमजोर पर चलता है। आज के वक्त में न जस्टिस जगमोहन जैसे लोग रह गए हैं जो देश की तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाने से नहीं हिचकते थे या फिर कृष्णमूर्ति जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे लोग।
आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सत्ता या विपक्ष या कोई और? हम अगर आक्षेप लगाने की बात करेंगे तो तत्काल सत्तारूढ़ दल को दोषी ठहरा देंगे मगर यह सच नहीं होगा। वास्तव में इसके लिए वह व्यवस्था दोषी है जिसने इसे भ्रष्ट या यूं कहें कि कुंठित बना दिया है। वह जनता भी इसके लिए दोषी है जो इसका हिस्सा है और गलत को ताली बजाकर बढ़ावा देती है।
यह लगातार देखने में आता है कि फलां जज या अफसर सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सरकार के किसी पद पर लगा दिया गया। उसे बड़ी सारी सुविधाएं मिल गर्इं। किसी को किसी आयोग में सेट कर दिया गया तो किसी को सेवाविस्तार दे दिया गया। योग्यतम व्यक्ति या पदाधिकारी की सेवाएं लेना अच्छी बात है मगर नए लोगों को योग्य बनाकर उनका स्थान ग्रहण करने की अहर्ता प्रदान करना उससे भी अच्छी बात है। अगर ऐसा हो जाए तो वे बहुत से लालची अफसर और जज गलत करने से बचेंगे, जिन्हें सत्ता के पक्ष में गलत करते वक्त यह भरोसा होता है कि उन्हें सेवानिवृत्त होने के बाद राजकीय सुख मिल जाएंगे। जिस व्यक्ति या अधिकारी ने अपनी 60 साल की सेवा में कोई बड़ी उपलब्धि देश समाज को नहीं दी, वो सेवानिवृत्ति के बाद क्या देगा? उसकी बजाय हमें उन युवाओं को मजबूती के साथ तैयार करना चाहिए जो 55 साल की उम्र में पहुंचकर उन पदों पर तीन से पांच साल तक कार्य करने को तैयार हों जो देश की संवैधानिक ताकत हैं। ऐसे लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और उसकी पारदर्शिता भी सामने रहनी चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जब मर्यादा को महत्व देते हैं तो उसके पीछे स्पष्ट है कि मर्यादाएं जीवन के हर पहलू में समाहित होती हैं। माता-पिता के साथ संबंधों की मर्यादा हो या पति-पत्नी और भाई-बहन के बीच। समाज और राजा के बीच भी मर्यादा होती है तो शत्रु और मित्र के साथ भी। जब प्रकृति अपनी मर्यादाओं के सहारे सृष्टि का निर्माण करती है तो हम क्यों न करें?
हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के भीतर एक बार कहा था कि गठबंधन धर्म की भी मर्यादा होती है। हम मर्यादा में रहेंगे और हर कोई उसका पालन करेगा तो कहीं संकट पैदा नहीं होगा। मर्यादाएं टूटने पर ही गठबंधन भी टूटते हैं और समाज भी। आज यह बातें समीचीन हैं क्योंकि शब्दों की मर्यादाएं हों या संस्कारों की, सभी टूट रही हैं। सियासत और सत्ता के लिए कोई भी किसी भी तरह का व्यवहार कर रहा है। न किसी को किसी दूसरे की उम्र का ख्याल है और न ही पद-प्रतिष्ठा का। मंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोग भी शब्दों की गरिमा नहीं समझ रहे, जिन पर समाज और देश को दिशा देने की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश में नागरिकों का आखिरी भरोसा न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं होती हैं। उम्मीद की जाती है कि वो अपनी मर्यादा का कड़ाई से पालन करेंगे। वो आमजन का भरोसा नहीं तोड़ेंगे। जब यही संस्थाएं भरोसा तोड़ती हैं, तब दुख होता है। नागरिक इस संकट के वक्त में यही सोचता है कि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं। ये हालात किसी भी लोकतांत्रिक सभ्य राष्ट्र के लिए भावी संकट का कारण बनते हैं। हम सब जानते हैं कि दुनिया में खाली हाथ आए थे और वैसे ही जाना है फिर भी वे हरकतें करने से नहीं चूकते जो समाज के सम्मुख निंदक हैं। आखिर क्यों? भारतीय धर्मग्रंथों ने हमें राह दिखाने के लिए इतना कुछ प्रस्तुत किया है कि हम कभी हार न सकें, न किसी संकट के आगे और न ही सत्ता की निरंकुशता के आगे। यह तभी संभव है जब हम सब अपनी मर्यादाओं का पालन करें।
हमारा देश गंगा-जमुनी और सूफी-संतों की तहजीब वाला देश रहा है। यही तहजीब हमारी ताकत भी थी और उसके बूते ही हम विश्व में एक अलग स्थान भी बना सके। देश को जरूरत है कि हम इस संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करते हुए, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करें। हम यह भी सोचें कि हम अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? क्या हम सिर्फ भोग करने के लिए आए हैं और प्रकृति, देश और समाज ने हमें जो दिया वह सिर्फ अपने लिए दिया है? हम तो सामुहिकता की सोच वाली संस्कृति के लोग हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की संस्कृति हमारे देश की रही है, तभी हम विश्व गुरु की उपाधि पा सके थे। अगर हम उस मर्यादा को बहाल कर सकेंगे तो एक आयाम स्थापित करेंगे, अन्यथा बेड़ा गर्क होना तय है।
जय हिंद।
अजय शुक्ल
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )
ajay.shukla@itvnetwork.com

Analysis-Congress manifesto showing Rahul’s theme: विश्लेषण-राहुल थीम को दशार्ता कांग्रेस का घोषणा पत्र

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार को 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में अपने प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया। अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा पत्र जारी करते हुए यह भी जता दिया कि यह उनके थीम पर आधारित है जो उन्होंने साल भर में देश के कोने कोने से मिले फीडबैक पर तैयार किया है। इस घोषणापत्र में डा. मनमोहन सिंह की विशेषज्ञता स्पष्ट रूप से झलकी। नतीजतन वाक पटुता में माहिर अरुण जेटली भी घोषणाओं पर सवाल नहीं उठा पाये। जेटली ने सिर्फ भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को खत्म करने के वादे पर कांग्रेस को घेरा है। अंग्रेजी हुकूमत में इस धारा को भारतीयों के उत्पीड़न के लिए इस्तेमाल किया जाता था।। भारतीय अंदोलनों को दबाने के नाम पर लाखों लोगों को इस धारा के माध्यम से परेशान किया जाता था। अंग्रेजी हुकूमत के जाने के बाद इस धारा के दुरुपयोग का आरोप सत्ता में आये दलों पर भी लगा। उन्होंने विरोधियों को दबाने के लिए इसका इस्तेमाल किया। जेटली की प्रतिक्रिया यह थी कि कांग्रेस का घोषणा पत्र देश को तोड़ने वाला है। घोषणा पत्र में आपराधिक मानहानि की आईपीसी की धारा 499 को हटाकर सिर्फ दीवानी वाद के तौर पर रखने की बात कही है। देखने में आया है कि इस धारा का भी दुरुपयोग किया जाता रहा है।
कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में बेरोजगार युवाओं, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के हित में योजनाएं लाने की बात कही है। घोषणा पत्र में जो अध्यक्ष राहुल गांधी की कलम से लिखा गया है कि लोकतंत्र और उसके साथ समाहित जनहित के मुद्दों का लोप होना संकटकारक है। उनकी सरकार बनी तो व्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करने के साथ ही गरीबी, बेरोजगारी और समाज को तोड़ने वाली बुराइयों को खत्म किया जाएगा। जैसा कि उन्होंने स्पष्ट किया उसी के अनुकूल 52 वादे किये गये हैं। इन वादों को पूरा करने का संकल्प भी दोहराया गया है। युवाओं को सबसे पहले रखते हुए रोजगार पर नजरिया स्पष्ट किया गया है। सरकारी नौकरियों के साथ ही निजी और सहकारिता के क्षेत्र में रोजगार सृजन की बात की गई है। जो युवाओं को लुभाएगी। यही नहीं दूसरा वादा उद्योगों को अनुकूल माहौल देने का है जिससे वे बड़ी इकाइयां लायें और रोजगार के वादे को पूरा करने में मदद करें। इसके लिए एमएसएमई क्षेत्र के व्यवसायियों को सहयोग देने की बात की गई है।
कांग्रेस ने किसानों के दर्द को भली भांति समझा है। स्पष्ट किया है कि जब बड़े बैंक डिफाल्टर बैंकों को कंगाल करते हैं और बचकर निकल लेते हैं तो किसानों का उत्पीड़न छोटी सी पूंजी के लिए नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को कोट किया है कि ‘सब कुछ इंतजार कर सकता है पर कृषि नहीं।’ किसानों को फसली ऋण पर कानूनी कार्रवाई से संरक्षण देने के साथ ही एमएसपी को लेकर अन्य हितकारी वादे किये हैं।
किसानों से बीमा कंपनियों की लूट पर घेरा है। गरीबी खत्म करने की मियाद 2030 तय करते हुए कांग्रेस ने न्यूनतम आय योजना के तहत 72 हजार सालाना आय को सुनिश्चित बनाने पर जोर दिया है। कांग्रेस ने सेना और अर्ध सैन्य बल के लिए एक बेहतर नीति बनाने जिससे सभी शहीदों को बराबर सम्मान और सहायता मिल सके का वादा किया है। पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन की विसंगतियों को दूर करने का भरोसा दिया है। विदेश नीति में सुधाकर उसे राष्ट्रहितकारी बनाने की बात कही गई है। उसने व्यापारी हित में उन सभी टैक्स को खत्म करने की बात की है जो उसे आतंकित करते हैं। यही नहीं घोषणा पत्र में महिलाओं, आदिवासियों और अनुसूचित जातियों को संबल देने की बात कही गई है।
कुल मिलाकर घोषणा पत्र को इस तरह से बनाया गया है कि कांग्रेस सरकार रोजगारोन्मुखी और न्यूनतम जीवन जीने की सुरक्षा दिला सके। घोषणाओं को पूरा किया जा सकता है मगर उसके लिए नीतिगत काम करने की जरूरत है। राफेल जैसे घोटालों के आरोपों को आधार बनाकर भ्रष्टाचार निरोधी और पारदर्शी शासन स्थापित करने का वादा करके ईमानदार सरकार दिखाया गया है।

अजय शुक्ल

Responsibility to maintain dignity of words: शब्दों की गरिमा बनाये रखना भी जिम्मेदारी

हम एक घटना का जिक्र करेंगे, अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी वाराणसी से चुनाव का नामांकन करने पहुंचे। वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में हराने वाले समाजवादी नेता राजनारायण भी पहुंच गए। राजनारायण ने कमलापति के पांव छुये और उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए आशिर्वाद मांगा। कमलापति ने उनकी जमानत राशि जमा करने के साथ ही चुनाव लड़ने के लिए 10 हजार रुपए दिए। कमलापति चुनाव जीत गए तो सबसे पहले राजनारायण ने पांव छूकर उन्हें माला पहनाई। कमलापति ने उनको कार्यकर्ताओं का मुंह मीठा कराने के लिए एक हजार रुपए और दिए। यह व्यवहार हमारी संस्कृति और संस्कार का प्रतीक है।

हमने इसी तरह का व्यवहार 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी का भी देखा, जब वह कई उन बड़ों के पास गए जो कांग्रेसी विचारधारा के थे मगर वाजपेयी ने झुककर प्रणाम करने में कोई देरी नहीं की। एक अन्य उदाहरण, हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का है। उन्होंने वैचारिक विरोधी समझे जाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया था। डॉ. अंबेडकर कांग्रेस प्रत्याशी काजरोल्कर जो दूध बेचते थे, से चुनाव हार गए। यह दोनों लोग अंग्रेजी हुकूमत में भी लाभ के पद पर रहे थे मगर पंडित नेहरू ने उन्हें सम्मान दिया। पंडित नेहरू और कमलापति ने अपने व्यवहार से अपने व्यक्तित्व की एक बड़ी लकीर बगैर किसी की काट किए खींच दी, जिसे इतिहास मिटा नहीं सकता।
भाजपा का मायने संस्कारित भाषा और व्यवहार वाली पार्टी होता था। हमने अटल बिहारी वाजपेयी को निजी तौर पर देखा है। उनके व्यवहार में कभी अमर्यादित भाषा नहीं दिखी। वह प्रधानमंत्री न होते हुए भी कई बार उस पद से अधिक बड़े दिखते थे। कई बार व्यक्ति छोटा होता है और पद बड़ा, तो कई बार पद बड़ा होता है और कद छोटा। आज के परिवेश में चिंतन मौजूं है। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में दो बातें कहीं, एक पाकिस्तान चाहता है कि मैं हार जाऊं और दूसरी, कांग्रेस ने हमें काम नहीं करने दिया। हमें आश्चर्य हुआ कि हमने जिसे न केवल केंद्र में बल्कि राज्यों में भी भरपूर समर्थन दिया, वह प्रधानमंत्री जो खुद को मजबूत नेतृत्व साबित करने के लिए अभियान चलाता है, क्या इतना कमजोर है कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी न ले पाने वाली कांग्रेस से डर गया। 44 सदस्यों वाली कांग्रेस ने उसे काम नहीं करने दिया। हालांकि पाकिस्तानी राग पुराना है। गुजरात चुनाव के दौरान इसी तरह का तमाशा देखने को मिला था। मणिशंकर अय्यर सबको याद हैं, अगर अय्यर ने साजिश रची थी तो एफआईआर क्यों नहीं हुई? चुनाव के बाद चर्चा भी नहीं हुई। पांच साल की सत्ता संभालने के बाद अपनी उपलब्धियों पर चुनाव लड़ा जाता है न कि विपक्षी दलों को कोस कर। निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग प्रधानमंत्री जैसे पद की गरिमा को गिराता है। हमें याद है कि पिछले चुनावों में मोदी ने कभी खुद को नीच जाति का तो कभी चायवाला और अब चौकीदार जैसी संज्ञाओं से विभूषित किया है। यही नहीं कई बार ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया जिनको लिखना हमारे संस्कारों के विपरीत है।

संस्कारों का सृजन करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हमें ऐसे शब्द और व्यवहार तो नहीं सिखाये थे। भाषा की मर्यादा बेहद जरूरी है क्योंकि पद और सत्ता वक्ती होती है मगर शब्द इतिहास रचते हैं। इतिहास में दर्ज विचारक जिन्होंने कोई पद नहीं पाया मगर उनके शब्दों का वक्त बे वक्त संदर्भ लिया जाता है। हमारे मनीषियों ने स्पष्ट किया है कि सत्ता शक्ति के साथ कुछ बुराइयां भी आती हैं। अगर हम उनके शिकार नहीं होते तभी श्रेष्ठ कहलाते हैं। हम लोकतंत्र में रहते हैं और लोकतंत्र जनता जनार्दन में निहित है। अगर वह मोदी को दोबारा चुनती है, तो उनका फैसला सिर माथे पर। लेकिन, क्या सत्ता में आने के बाद वे शब्द वापस आ पाएंगे, जो सार्वजनिक मंच से बोले जा चुके हैं? बिल्कुल नहीं, ये शब्द तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए। हमारे नीति नियताओं की यह महती जिम्मेदारी है कि वे शब्दों का संयम और संस्कार बनायें रखें। बड़े पदों पर बैठे लोगों से सत्य और तथ्य पर शालीन बातों की उम्मीद की जाती है। उनसे मनगढ़ंत बातें और मिथ्या इतिहास को जनता नहीं सुनना चाहती बल्कि उनकी उपलब्धियों पर स्वस्थ चर्चा की अपेक्षा करती है। अधिक बोलने के चक्कर में ऐतिहासिक तथ्यों का घालमेल मत कीजिए। विपक्षी दलों का मजाक बनाने के बजाय उनके आरोपों के जवाब दीजिए।
भारत वह देश है जहां अभी भी 30 करोड़ से अधिक लोग एक वक्त की रोटी के लिए अपना जीवन संकट में डालते हैं। ऐसे देश में राजनीतिक दल जब आलीशान दफ्तरों में बैठकर उनकी बात करते हैं, तो लगता है कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। निश्चित रूप से अपने दफ्तरों को अच्छा बनाना चाहिए मगर उससे पहले जिन नागरिकों के लिए सियासी दल हैं, उनके जीवन को बेहतर बनाने का काम करना चाहिए। किसी का भी चरित्रहनन करना हमारी संस्कृति नहीं है बल्कि अपनी संस्कृति का बड़प्पन प्रस्तुत करना हमारा दायित्व है। हम किसी की लकीर को छोटा करके बड़े बनने वाले लोग नहीं हैं बल्कि प्रतिस्पर्धी की लकीर से अपनी लकीर को बड़ा करने वाली संस्कृति के लोग हैं। यही विचार और ज्ञान हमें विश्व गुरु बनाता था, न कि छिछले शब्द। दुख तब होता है जब हम गलत तथ्यों को प्रस्तुत करके किसी की बुराई करते हैं और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं। हाल के दिनों में सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की तस्वीरों को फोटोशोप के जरिए भद्दे और अश्लील तरीके से प्रस्तुत करके सोशल मीडिया पर परोसा गया। भाजपा के आईटी सेल पर इसके विस्तार का आरोप लगा। सवाल यह उठता है कि जब ऐसी घिनौनी हरकतें होती हैं तो भाजपा और सरकार के जिम्मेदार लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते और इन हरकतों के लिए क्षमा क्यों नहीं मांगते?
हमारी संस्कृति किसी का चारित्रहनन करने की इजाजत नहीं देती। किसी मृत व्यक्ति को लांछित करना घिनौना कृत्य माना जाता है। कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि खुद को बड़ा दिखाने के लिए कुछ सियासी लोग तत्कालीन बड़ों का चरित्रहनन कर रहे हैं। इस काम के लिए लाखों रुपए वेतन पर विशेषज्ञों को रखा गया है। दुनिया के इतिहास पर गौर करेंगे तो विश्व के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका से लेकर तमाम छोटे मुल्कों तक दर्जनों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब गरीब और भुखमरी के शिकार परिवारों की पृष्ठभूमि के लोग राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़े पदों पर पहुंचे। उन्होंने कभी इस बात का बखान नहीं किया कि वे दयनीय हैं। अब्राहम लिंकन हों या बराक ओबामा दो पीढ़ियों के राष्ट्रपति उदाहरण हैं। उन्होंने कभी शब्दों की मर्यादा को नहीं खोया। आलोचनाएं और सम्मान करने वालों को समान तरीके से लिया। यह बड़प्पन होता है। उच्च पदों पर पहुंचने वालों से इसी तरह के व्यक्तित्व की उम्मीद की जाती है, न कि निम्न स्तरीय शब्दों की। ऐसे शब्दों का स्थान न चुनाव प्रचार में और न ही शासन सत्ता संचालित करने में हो सकता है। उम्मीद है कि भविष्य में हमारे नेता हमारे मार्गदर्शक बनेंगे न कि पथ भ्रमित करने वाले। वे अपने व्यवहार और भाषा के संयम से इतिहास में सम्मानजनक स्थान दर्ज कराएंगे।
जय हिंद।
अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

Learn to differentiate between truth and falsehood: सच और झूठ में अंतर करना सीखिये

लोकतंत्र में आमचुनाव देश का भविष्य तय करते हैं। 17वीं लोकसभा के गठन के लिए निर्वाचन की अधिसूचना जारी हो चुकी है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की दिशा और दशा तय करने वाला यह चुनाव कई कारणों से महत्वपूर्ण है। सच और झूठ के अंतर को पहचानने के साथ ही सही चयन करने का वक्त है। एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर आप देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, यह आपका मत ही तय करेगा। सात चरणों में मतदान कराने का आशय भी यही है कि आपको सोचने समझने और सच को पहचाने के लिए वाजिब वक्त मिले। इस वक्त का सदुपयोग करना आपका काम है। झूठ-फरेब से न घर चलता है और न ही देश। इनके लिए जमीनी तौर पर काम करना होता है। हमारे हित चिंतकों ने गहन अध्ययन के बाद संविधान में किसी भी सरकार के लिए पांच साल का कार्यकाल रखा था, जिससे सत्ता में काबिज जन और दल परियोजनाओं से लेकर जनापेक्षाओं को इस समय सीमा में पूरा कर सकें। पांच साल का वक्त पर्याप्त माना जाता है। अगर कोई व्यक्ति या पार्टी इस समय सीमा में भी अपने किए वादों को पूरा नहीं कर पाती तो यह तय है कि उसकी दिशा और दशा दोनों भ्रमित हैं।
16वीं लोकसभा के लिए जब 2014 में चुनाव की बयार बह रही थी, तब लोग बदलाव की बात कर रहे थे। यह बदलाव सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए था। नरेंद्र मोदी की अगुआई में सत्ता के लिए संघर्ष कर रही भाजपा पर लोगों ने यकीन किया। मोदी ने जनता की अपेक्षाओं के अनुकूल ओज से परिपूर्ण वादे किए। इन वादों पर मोदी सरकार कितनी खरी उतरी और जनता उनके काम से कितना संतुष्ट है? यह जनता का मत के तय करेगा। हमारा दायित्व है कि सच बतायें और दिखायें। इसी तरह हर किसी का अपना कर्तव्य है। सच की ताकत ऐसी होती है जो न केवल झूठ को बेनकाब करती है बल्कि हमें भविष्य के तमाम खतरों से बचाता है। चुनाव जीतने के लिए अब सियासी जन वे सभी हथकंडे अपनाने लगे हैं, जो कभी निंदनीय और घृणित माने जाते थे। नेताओं की हालत यह है कि निजी जीवन पर भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाये जाते हैं। व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के अंतर को खत्म कर दिया गया है। विपक्ष में रहते हुए जो लोग और दल जिन कार्यों पर सवाल उठाते थे, सत्ता में आते ही वे भी वही करने लगते हैं। राजनीति में मर्यादाओं और नैतिकता का स्थान खत्म होता जा रहा है।
हमें देखना होगा कि जब 1952 में देश को पहली लोकसभा मिली थी। वो चुनौती भरा वक्त था, हर नागरिक के लिए खाना, रोजगार और विकास करना था मगर उसके लिए धन नहीं था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनते वक्त कहा था कि जब तक देश के किसी भी नागरिक की आंख में आंसू है तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा। निश्चित रूप से उस वक्त इन चुनौतियों को पूरा करना बेहद मुश्किल था क्योंकि हमारा देश भुखमरी, गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा था। न इंफ्रास्ट्रेक्चर था और न ही उसके लिए वित्तीय संसाधन। कंगाल देश के नेता के रूप में जब नेहरू ने काम किया तो देश में हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति, औद्योगिक क्रांति, आयुध क्रांति, शैक्षिक क्रांति, वैज्ञानिक तकनीक क्रांति के साथ ही राष्ट्रीय विकास हुआ। देश तेजी के साथ आगे बढ़ा और हम वैश्विक मंच पर खड़े हो गए। हमारी संस्थाओं ने विश्व में बड़ी जगह बनाई। हमारे लोगों को देश-विदेश में रोजगार और सम्मान मिला। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की साख बनी, क्योंकि यह सब सच पर आधारित था, झूठ-फरेब के प्रचार पर नहीं। यह वो वक्त था, जब हमें पाकिस्तान और चीन दोनों से युद्ध में भी जूझना पड़ा। पंडित नेहरू के बाद की पीढ़ी पर उनकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का जिम्मा था, जो उन्होंने किया। जनता ने उनके कामों को न केवल सराहा बल्कि मुहर लगाई।
अब 17वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव में दो बातें अहम हैं। पहली, जो वादे किए गए, उन पर क्या हुआ? दूसरी, किसने झूठ और फरेब का सहारा लिया और किसने सच को तोड़ा मरोड़ा? 2014 में मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों और 10 साल के सरकार के सत्ताविरोधी लहर से जूझ रही थी। भाजपा ने कारपोरेट स्टाइल में नरेंद्र मोदी को हिंदुत्व विकास पुरुष के साथ ही अच्छे दिनों के रूप में प्रस्तुत किया। देश की जनता जनार्दन ने मोदी पर भरोसा जताया। लंबे वक्त बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी। मोदी का नाम अच्छे दिनों का पर्याय बन गया, नतीजतन देश के डेढ़ दर्जन राज्यों में भी भाजपा ने सरकार बनाई। मोदी सरकार ने कई कड़े फैसले लिए और बदलाव किए। सरकार ने अपने रिपोर्ट कार्ड में यही कहा कि उसने देश को अच्छे दिन लौटा दिए हैं। पड़ोसी देशों के साथ ही वैश्विक मंच पर भारत को सशक्त बनाने का दावा किया गया है। इन सब दावों के पीछे तमाम दलीलें प्रस्तुत की जा रही हैं। दूसरी तरफ मोदी सरकार पर राफेल विमान खरीद घोटाले सहित भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लग रहे हैं। कई मंत्रियों की योग्यता सवालों के घेरे में है। मोदी सरकार को झूठी-जुमलेबाज सरकार के आरोपों से भी दो चार होना पड़ रहा है।
विपक्ष ने मोदी सरकार को चौकीदार चोर है और झूठी सरकार के स्लोगन से घेरा है, तो मोदी ने मैं भी चौकीदार कहकर बचाव किया है। आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच उन मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं कर रहा, जिनसे देश आगे बढ़ता है और युवा रोजगार पाता है। हर मुद्दे पर निजी हमले, सोशल मीडिया का राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम की चर्चाएं हावी हैं। सवाल 2014 के उन नारों के बीच उलझा है कि क्या देश में अच्छे दिन लौट आए हैं? किसके अच्छे दिन आए हैं और किसने झूठ बोला? 2019 के चुनाव में मतदाता किस बात को सही समझता है और किसको गलत? उसे कैसा भारत चाहिए? भविष्य में बेरोजगार और असमानता की ओर बढ़ता भारत कहां खड़ा होगा? प्रचार माध्यमों पर टिका विकास देश को कहां ले जाएगा? सभी सवालों पर चर्चा और वास्तविकता को देखना आवश्यक है।
गंगा-जमुनी तहजीब और सूफी-संतों की सोच वाले देश को हमें कहां ले जाना है? इस बारे में देश और देशवासियों को मतदान करते वक्त सोचना होगा। किसी के आरोपों प्रत्यारोपों से कुछ होने वाला नहीं, क्योंकि अंतत: नागरिक को ही अपने मत से तय करना है कि सरकार पास है या फेल। उसे ही तय करना है कि वह क्या चाहती है और क्यों? लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि है और उसका फैसला भाग्यविधाता। ऐसे में सच को जानना-पहचानना आपकी जिम्मेदारी है क्योंकि झूठ परोसने से किसी को रोका नहीं जा सकता। सागर में मोती उसी को मिलता है जो जितना अंदर जाकर उसे खोजता है।
जय हिंद।

 अजय शुक्ल

ajay.shukla@itvnetwork.com
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)