Home टॉप न्यूज़ Analysis of Parliamentary Hot Seat Mainpuri by Ajay Shukla: हॉट सीट मैनपुरी संसदीय सीट का विश्लेषण-अजय शुक्ल: गूंजता है नेताजी का नाम

Analysis of Parliamentary Hot Seat Mainpuri by Ajay Shukla: हॉट सीट मैनपुरी संसदीय सीट का विश्लेषण-अजय शुक्ल: गूंजता है नेताजी का नाम

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मैनपुरी में हर कोई नेताजी (मुलायम सिंह) की रैली में मायावती के संबोधन को सुनना चाहता था। ऐसा पहली बार हुआ है। नेताजी की धरती पर मायावती के सद्भावनापूर्ण भाषण ने चुनावी फसल को सोने की फसल बना दिया है। यह संसदीय सीट मुलायम सिंह के अलावा किसी की लहर को नहीं पहचानती। ऐसे में मायावती के अखिलेश और मुलायम के साथ मंच पर आने मात्र से चुनाव ने करवट ले ली। यही नहीं माया ने मुलायम सिंह को हाथ जोड़कर जब अभिवादन किया तो जनता भावविभोर हो गई। निश्चित रूप से इस रैली का असर आने वाले बाकी के पांच चरणों के चुनाव में दिखना तय है। माना जा सकता है कि यूपी की सियासत में मैनपुरी एक बदलाव लाने जा रहा है क्योंकि जो भ्रम इस रैली के पहले तक नेताजी को लेकर था, उस पर अब विराम लग गया। देश के पहले आमचुनाव 1952 में यहां से कांग्रेस के बादशाह गुप्ता सांसद बने। उसके बाद यह सीट दूसरे चुनाव 1957 में बदलाव का कारक बनी और यहां से समाजवादी बंसीदास धनगर सांसद बने। 1962 में फिर कांग्रेस के बादशाह गुप्ता और 1967 तथा 1971 में कांग्रेस के महाराज सिंह और 1984 में इंदिरा गांधी के शोक की लहर में बलराम सिंह यादव जीते। 1977 में यह सीट भारतीय लोकदल रघुनाथ सिंह वर्मा ने जीती जो 1980 में जनता पार्टी सेकुलर से दोबारा जीते। 1989 में जनतादल की लहर में यह सीट उदय प्रताप सिंह के पास पहुंच गई, जो 1991 में जनता पार्टी से फिर जीते। 1996 में इस सीट पर मुलायम सिंह यादव आये जिनके नाम पर यह सीट चलने लगी। 1998 और 1999 में बलराम सिंह यादव ने मुलायम के सिपाही के तौर पर चुनाव जीता। 2004 में एक बार फिर मुलायम इस सीट पर लौटे मगर उन्होंने अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव के लिए सीट छोड़ दी। 2009 और 2014 में फिर मुलायम यहां से सांसद बने। 2014 में यह सीट मुलायम ने अपने पोते तेज प्रताप सिंह यादव के लिए छोड़ दी। इस बार फिर मुलायम इस सीट पर लौटे हैं। माना जा रहा है कि यह उनका आखिरी चुनाव है।
मैनपुरी जिले की सभी विधानसभा सीटों पर भी मुलायम का नाम चलता रहा है मगर 2017 में अखिलेश मुलायम की रार में लोगों ने अखिलेश के प्रति नाराजगी दिखाई थी। शुक्रवार की मुलायम-माया और अखिलेश की रैली के बाद कोई संशय नहीं रह गया मैनपुरी क्षेत्र असल में नेताजी के भाई पूर्वमंत्री शिवपाल सिंह यादव की कर्मभूमि के तौर पर देखा जाता रहा है। इसी संसदीय सीट क्षेत्र में शिवपाल का विधानसभा क्षेत्र जसवंतनगर आता है। यहां के लोगों में एक भ्रम था कि शिवपाल के समर्थन में और अखिलेश के विरोध में नेताजी मायावती के साथ नहीं आएंगे मगर यह भ्रम टूटने से हालात बिल्कुल बदल गये हैं।
2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट पर 16 लाख से अधिक मतदाता थे। जातीय समीकरण के अनुसार यह सीट यादव बाहुल्य है, जो करीब 35 फीसदी है। करीब साढ़े तीन लाख मतदाता दलित समुदाय से है। ढाई लाख मतदाता शाक्य बिरादरी से है। एक-एक लाख क्षत्रिय और मुस्लिम मतदाता हैं। सवा लाख के करीब ब्राह्मण और इतने ही वैश्य समुदाय के मतदाता हैं। बाकी मतदाता भी तमाम पिछड़ी जातियों के हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभाएं हैं, मैनपुरी, भोगांव, किशनी, करहल और जसवंतनगर। 2017 के चुनाव में जसवंतनगर सपा के शिवपाल यादव को मिली जबकि भोगांव भाजपा और शेष तीनों भी सपा के खाते में गई थी। मोदी लहर में भी तेजप्रताप सिंह यादव ने यहां 65 फीसदी वोट हासिल किये थे। उस वक्त यहां कुल 62 फीसदी मतदान हुआ था। शुक्रवार को हालात यह थे कि रैली स्थल से 10 किमी पहले वाहनों को रोक दिया गया था मगर मुलायम-माया के समर्थक धूप-गर्मी की परवाह किये बगैर यहां पैदल दौड़े आये थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मैनपुरी वासियों के मुलायम के अलावा कुछ नहीं चाहिए। माया-मुलायम की यह रैली यूपी की सियासत में एक बड़े बदलाव का कारक बनने जा रही है। कभी डकैत छविराम, निर्भय गुर्जर, मानसिंह जैसे डकैतों की की धरती रहा मैनपुरी अब बदल रहा है। वहां के युवा विकास की बात करते हैं। ऐसे दौर में उन्हें अपने नेता मुलायम सिंह और मायावती ही नजर आते हैं। मुलायम ने यहां सभी बिरादरियों में पकड़ बनाई है। जो वोट मुलायम से कटता था, वो भी माया के आने से एकजुट हो जाएगा। और हां मुलायम और माया के एक साथ आने पर वह पुराना नारा भी फिर से दोहराया जाने लगा है, मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।

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