Home टॉप न्यूज़ Analysis of Hot Seat RaeBareli by Ajay Shukla: हॉट सीट रायबरेली का विश्लेषण:अजय शुक्ल: फिरोज से सोनिया तक, गांधी-नेहरू परिवार ही पहली पसंद

Analysis of Hot Seat RaeBareli by Ajay Shukla: हॉट सीट रायबरेली का विश्लेषण:अजय शुक्ल: फिरोज से सोनिया तक, गांधी-नेहरू परिवार ही पहली पसंद

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रायबरेली सीट का जिक्र आते ही हमें गांधी-नेहरू परिवार की याद ताजा हो जाती है। फिरोज जहांगीर गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक इस सीट पर अब तक सिर्फ एक बार गांधी परिवार को हार का मुंह देखना पड़ा जब 1977 में समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा विरोधी लहर में जीत दर्ज कराई थी। रायबरेली अब तक इसे अपनी ऐतिहासिक भूल मानती है। गांधी परिवार की अनुपस्थिति के चलते 1996 और 1998 में कांग्रेस को यहां हार का मुंह देखना पड़ा था। भले ही उत्तर प्रदेश में पिछले 30 सालों से कांग्रेस सत्ता में नहीं है मगर कांग्रेस की सरकार और उसके सांसदों ने रायबरेली को भरपूर दिया है। यहां राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर के इतने संस्थान तथा उद्योग लगे, जितने कहीं और नहीं लगे। यहां के लोगों को सिंचाई और सड़क से लेकर रेल तक की इतनी हर सुविधा दी गई। गांवों में सड़कों का जाल बिछा। उद्योग धंधों के साथ ही शहर भी चमका मगर राज्य में सत्ता न होने के चलते तमाम योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल सका जितना मिल सकता था। यही कारण है कि रायबरेली के बाशिंदे गांधी परिवार के अलावा किसी पर यकीन नहीं करते।

देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू के दामाद अंग्रेजी के प्रख्यात पत्रकार फिरोज जहांगीर गांधी पहली बार 1952 में इस सीट से सांसद बने। उस वक्त यह सीट रायबरेली प्रतापगढ़ कहलाती थी और दो सांसद होते थे। दूसरे सांसद कांग्रेस के बैजनाथ कुरील बने। उस वक्त अमेठी भी इसी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था। 1957 में यह संसदीय सीट पूर्ण अस्तित्व में आई तब फिर से फिरोजगांधी यहां से चुने गये। 1960 में उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद कांग्रेस के आरपी सिंह सांसद बने। 1962 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर बैजनाथ कुरील फिर से सांसद बने। लाल बहादुर शास्त्री ने जब इंदिरा गांधी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया तो उनका कद बढ़ा और फिर जब वह देश की प्रधानमंत्री चुनी गईं तो उन्होंने 1967 के चुनाव में इस सीट पर जीत दर्ज कराई। प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र बनते ही यह अति पिछड़ा क्षेत्र विकास की दौड़ में आगे निकलने लगा। 1971 में इंदिरा गांधी ने रिकार्ड जीत दर्ज कराई मगर 1977 में उन्हें आपातकाल का खामियाजा भुगतना पड़ा और समाजवादी नेता राजनारायण ने उन्हें पराजित किया। हालांकि 1980 के चुनाव में रायबरेली की जनता ने उनसे माफी मांगी और पुनः सांसद बनाया मगर जीतने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद अरुण नेहरू 1981 और 1984 में सांसद बने। उनके बाद 1989 और 1991 में शीला कौल यहां से सांसद बनीं मगर उन्होंने क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया। नतीजतन 1996 और 1998 में यहां से भाजपा के अशोक सिंह जीते। 1999 में सोनिया के लिए अमेठी सीट छोड़कर रायबरेली पहुंचे कांग्रेस के सतीश शर्मा ने भाजपा के अरुण नेहरू को पटखनी दी। 2004 से 2014 तक सोनिया गांधी ने यहां से चार चुनाव जीते। गुरुवार को उन्होंने 5वीं बार यहां से अपना नामांकन दाखिल किया है।

गांधी परिवार रायबरेली के विकास को लेकर सदैव संजीदा रहा। यहां पांच विधानसभा सीटें बछरावां, हरचन्दपुर, रायबरेली, सरेनी और ऊंचाहर हैं। 1989 तक राज्य में कांग्रेस सरकार होने के कारण विकास की गाड़ी बड़ी तेजी से दौड़ी मगर उसके बाद यूपी में कांग्रेसी सत्ता न होने के कारण यूपी की सत्ता में काबिज रही सपा, बसपा और भाजपा सरकारों से कुछ नहीं मिल सका। केंद्र में कांग्रेस की सरकार रहते केंद्रीय योजनाओं की यहां झड़ी लगती रही। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक ने रायबरेली क्षेत्र को बहुत कुछ दिया। केंद्र सरकार की इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज मुख्य है। ऊंचाहार का पावर प्लांट हो या बेहता ब्रिज, इंदिरा गार्डन, डलमऊ, समसपुर बर्ड सेंचुरी सभी कांग्रेस की ही देन हैं। इसके अलावा एनटीपीसी, सीमेंट फैक्ट्री, रेल कोच फैक्ट्री, आईटीआई जैसी तमाम इकाइयां और उद्योग लगाकर कांग्रेस ने रायबरेली के लोगों को रोजगार दिया था। फुरसतगंज में हवाईपट्टी तो है ही, विमान प्रशिक्षण स्कूल भी है। रायबरेली में राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट जैसा उच्चस्तरीय संस्थान इस इलाके पर गांधी परिवार के प्रभुत्व को दर्शाने के लिए काफी है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन डिजाइनिंग और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फार्माच्युटिकल जैसे संस्थान सोनिया गांधी लेकर आईं। रेल कोच फैक्ट्री की नीव रखी और आईआईटी का सेटर भी यहां स्थापित किया। एम्स की ओपीडी भी शुरू हुई थी मगर भाजपा सरकार में नाइपर, एम्स और आईआईटी के सेंटर यहां से दूसरे स्थानों में ट्रांसफर कर दिये गये। स्थानीय लोगों का कहना है कि कांग्रेस ने रायबरेली को दिया मगर भाजपा सहित अन्य दलों ने उन परियोजनाओं को छीनने का काम किया है।
इन हालात पर चर्चा करते हुए पूर्व विधायक अखिलेश सिंह कहते हैं कि रायबरेली गांधी-नेहरू परिवार की अहसानमंद है और जनता उनका साथ नहीं छोड़ने वाली। सोनिया गांधी के खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी विधायक डीपी सिंह हैं। डीपी सिंह भी रायबरेली में हुए कामों को लेकर कांग्रेस के दावे पर मोहर लगाते हैं मगर कहते हैं कि उनके लगाये आधे से अधिक उद्योग बंद हो चुके हैं। हम उन्हें चलवाने का काम करेंगे जिससे एक बार फिर से रायबरेली के लोगों को रोजगार मिल सके। कांग्रेस नेता कहते हैं कि कांग्रेस ने उद्योग लगवाये थे मगर विरोधी दलों ने उन्हें बंद करवाने का काम किया।

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