Home टॉप न्यूज़ Analysis of Hot Seat Lucknow by Ajay Shukla: हॉट सीट लखनऊ का विश्लेषण- अजय शुक्ल: राजनाथ के व्यक्तित्व के आगे विपक्ष धूमिल

Analysis of Hot Seat Lucknow by Ajay Shukla: हॉट सीट लखनऊ का विश्लेषण- अजय शुक्ल: राजनाथ के व्यक्तित्व के आगे विपक्ष धूमिल

1 second read
0
0
212

देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लखनऊ संसदीय सीट से दोबारा नामांकन किया है। ‘लीडरशिप’ की गुणवत्ता से भरपूर राजनाथ सिंह को यह सीट अटल की विरासत के रूप में मिली थी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कई बार की हार के बाद राममंदिर लहर में 1991 में पहली बार यह सीट हासिल की थी। उसके बाद यह सीट उनकी ही होकर रह गई। राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री के रूप में अटल बिहारी की पसंद थे। कल्याण सिंह से तल्खी के बाद अटल ने राजनाथ को मजबूत किया। मुख्यमंत्री बनने के पहले तक राजनाथ सिंह कभी कोई चुनाव नहीं जीते थे। वह सदैव बैकडोर इंट्री के जरिए ही सदन के सदस्य बनते रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद राजनाथ के लिए कांग्रेसी नेता सुरेंद्रनाथ अवस्थी उर्फ पुत्तू अवस्थी ने हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से इस्तीफा दे दिया था। पुत्तू ने वहां से राजनाथ को लड़ाकर पहली बार विधानसभा का सदस्य बनवाया था। अटल बिहारी के मंत्रिमंडल में भी राजनाथ को राज्यसभा के रास्ते शामिल किया गया था।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने वाले राजनाथ सिंह ही नरेंद्र मोदी के चाणक्य बने। उन्होंने मोदी को वाराणसी संसदीय क्षेत्र से उतारकर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। राजनाथ का व्यक्तित्व इतना विशाल रहा है कि उनके आगे विपक्षी भी फीके पड़ जाते थे। उनका व्यक्तित्व सरदार पटेल के मानिंद दिखता रहा है। इसका नतीजा यह रहा कि कभी भी विरोधी दल के नेता भी उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाये। यूपी के शिक्षा मंत्री रहते उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव किया था। मुख्यमंत्री के रूप में सशक्त प्रशासक की भूमिका में नजर आये और अटल बिहारी के मंत्रिमंडल में रहते हुए उनकी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए लोगों को बेहतरीन सड़कों पर सरपट दौड़ाने का काम किया। शायद यही वजह रही कि मंगलवार को जब राजनाथ का काफिला नामांकन के लिए निकला तो हर तरफ एक ही आवाज थी, राजनाथ, फिर राजनाथ। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सीट को भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक कर्मभूमि माना जाता रहा है।
लखनऊ संसदीय सीट पर कुल 16 बार लोकसभा चुनाव हुए, इनमें सात बार भाजपा, छह बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। इसके अलावा भारतीय लोकदल, जनता दल और निर्दलीय ने एक-एक बार जीत दर्ज की है। कभी इस सीट की पहचान 1977 तक नेहरू परिवार की विरासत के रूप में थी। शिवराजवती नेहरू यहां की पहली सांसद थीं और उन्होंने 1952 में अटल बिहारी को बुरी तरह हराया था। उनके बाद प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित सांसद बनीं। 1957 में कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी ने अटल बिहारी को हराया और 1962 में कांग्रेस के बीके धवन यहां से सांसद बने। लखनऊ सीट का इतिहास सदैव लहर के साथ रहा। पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद 1967 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई थीं। उनकी पार्टी से टूटे तमाम दल और नेता उनके लिए दीवार बन रहे थे। कांग्रेस ने यहां से उद्योगपति कर्नल वीरआर मोहन को उतारा तो उनको निर्दलीय प्रत्याशी मशहूर शायर पूर्व जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने उन्हें हरा दिया। पंडित आनंद नारायण मुल्ला के बाद कोई भी निर्दलीय इस सीट को नहीं जीत सका। 1971 में इंदिरा गांधी की मामी शीला कौल ने लखनऊ में जीत दर्ज कराई। इंदिरा गांधी के खास होने के कारण मुख्यमंत्री रहे हेमंतीनंदन बहुगुणा 1977 में उन्हें धोखा दे गये और इंदिरा विरोधी लहर का फायदा उठाकर लखनऊ सीट पर भारतीय लोकदल से सांसद बने। 1980 और 1984 में यह सीट फिर से कांग्रेस की शीला कौल के हाथ आई। 1989 में जनता दल की लहर में यहां से शिक्षक नेता मांधाता सिंह ने कांग्रेस के दाऊजी को हराकर सीट कब्जाई।
1991 में कांग्रेस के रणजीत सिंह को हराकर अटल बिहारी बाजपेई पहली बार इस सीट से जीते। यह उनका गढ़ बन गया। पिछले 28 सालों में अटल के इस किले को कोई भी सियासी दल भेद नहीं सका है। पार्षद से लेकर महापौर और विधायक का चुनाव हो या फिर सांसद का, सबमें भाजपा हावी रही। अटल की तैयार की गयी जमीन पर तब से भाजपा फसल काट रही है। 2009 में सांसद प्रतिनिधि रहे लालजी टंडन इस सीट पर अटल जी की चिट्ठी लेकर जीते। 2014 के चुनाव में भी अटल की चिट्ठी चली और राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी की जीत के सभी रिकार्ड तोड़ते हुए नया रिकार्ड बनाया। कांग्रेस की रीता जोशी बहुगुणा को दो लाख 88 हजार वोट से ही संतोष करना पड़ा। सपा के आंकड़े 50 हजार के आंकड़े पर सिमट गये।
राजनाथ का कद बढ़ गया है कि नामांकन की तारीख निकल रही है मगर कांग्रेस, सपा-बसपा सहित कोई भी विरोधी दल उनके खिलाफ मंगलवार तक प्रत्याशी तक नहीं खोज पाया है। भाजपा के मीडिया प्रभारी मनीष दीक्षित और पूर्व महानगर उपाध्यक्ष मनीष शुक्ल कहते हैं कि इस सीट पर राजनाथ को चुनौती देने वाला कोई नेता किसी दल में नहीं है। लखनऊ का सबसे बड़ा वोटबैंक ब्राह्मण है जो राजनाथ के साथ है।

Load More Related Articles
Load More By Ajay Shukla
Load More In टॉप न्यूज़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

Let’s pay tribute to the soul of Indian politics!: चलिए भारतीय राजनीति की आत्मा को श्रद्धांजलि दें!

हमारे बाबा और नाना दोनों ही टोपी लगाया करते थे। खादी पहनकर अपने मूल्यों, संस्कृति और संस्क…