Home टॉप न्यूज़ Analysis of communal politics by Ajay Shukla: सांप्रदायिक सियासत का विश्लेषण-अजय शुक्ल: अटल पर हुए प्रयोग को अपना लिया भाजपा ने

Analysis of communal politics by Ajay Shukla: सांप्रदायिक सियासत का विश्लेषण-अजय शुक्ल: अटल पर हुए प्रयोग को अपना लिया भाजपा ने

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17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में सांप्रदायिकता एक बड़ा मुद्दा है। भारतीय जनता पार्टी की नीव ही इस पर टिकी है। यही कारण है कि अन्य दल भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं। हालांकि तमाम अन्य दल भी विभिन्न धर्मों को आधार बनाकर चुनाव लड़ते हैं। राम मंदिर से लेकर हिंदू-मुस्लिम हकों की बात विभिन्न दल अपनी परिभाषा के मुताबिक करते हैं। भाजपा ने यूपी में मुख्यमंत्री की कुर्सी उस शख्स को सौंपी जो खांटी महंत है। योगी आदित्यनाथ विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे। उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए बैकडोर इंट्री विधानपरिषद से दी गई। इसके अलावा कई जगह भगवाधारी कथित साधुओं और साध्वियों को उतारा गया। भाजपा ने यह प्रयोग उमा भारती से मध्यप्रदेश में किया था, जो सफल रहा था। इसी क्रम में भाजपा ने अब अदालत में आतंकी होने का आरोप निर्धारित होने के बावजूद प्रज्ञा सिंह को कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतारा है।
प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसी आतंकी के टिकट देने को लेकर स्वयं नरेंद्र मोदी के उस बयान पर सवाल खड़े होने लगे हैं जो उन्होंने 2014 में कहे थे कि उनकी पार्टी में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं। वे अदालत में चार्जफ्रेम हो चुके किसी शख्स को टिकट नहीं देंगे। प्रज्ञा सिंह के खिलाफ जांच में आतंकी होने के सबूत अदालत में एनआईए ने प्रस्तुत किये थे, जिन पर आरोप निर्धारित हो चुका है। प्रज्ञा को सेहत खराब होने और इलाज कराने के लिए जमानत दी गई थी, मगर वह इस वक्त चुनाव में ऐसे दौड़ती नजर आ रही हैं जैसे उन्हें कोई रोग ही नहीं। प्रज्ञा की जमानत रद्द कराने को लेकर एक याचिका दाखिल हो चुकी है। वह चर्चा में इसलिए आ रही हैं क्योंकि उन्होंने आतंकवाद से लड़ते हुए शहीद हुए वीर पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे पर अभद्र टिप्पणी की थी। इसके बाद पूरे देश में प्रज्ञा और भाजपा की किरकिरी हुई है। भाजपा प्रज्ञा के सहारे यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह अकेली हिंदूवादी है और इस वाद के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है।
चुनाव में हिंदू-मुस्लिम की शुरूआत करने का श्रेय भी जनसंघ को ही जाता है। 1952 में अटल बिहारी वाजपेई लखनऊ से चुनाव हार चुके थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बाद जनसंघ में कोई ऐसा नेता नहीं था जो संसद में मुखर होकर बात रख सके। पंडित दीन दयाल उपाध्याय चाहते थे कि अटल बिहारी वाजपेई किसी भी सूरत में संसद पहुंचे। उन्होंने 1957 के लोकसभा चुनाव में अटल को लखनऊ के अलावा हिंदू बाहुल्य वाली सीट मथुरा तथा नई बनी बलरामपुर सीट से चुनाव लड़ाने का फैसला किया। अटल लखनऊ से तो हारे ही मथुरा में निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप ने उनकी जमानत जब्त करा दी। बलरामपुर सीट पर अटल बिहारी वाजपेई ने नौ हजार से अधिक मतों से जीत दर्ज कराई। इस सीट पर अटल को सांप्रदायिक कारणों से ही लड़ाया गया था।
बलरामपुर में हिंदुओं की अच्छी खासी आबादी थी। राजा बलरामपुर के गुरू होने के कारण करपात्री जी का खासा प्रभाव था। 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव में उतरे, तो करपात्री जी ने अटल बिहारी का समर्थन किया। अटल के प्रतिद्वंदी कांग्रेस के प्रत्याशी हैदर हुसैन थे। जनसंघ और करपात्री जी ने इस चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम में तब्दील कर दिया, नतीजतन वाजपेयी करीब 9 हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीत गए। मजबूरन 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अंबाला और करनाल से सांसद रह चुकीं ब्राह्मण चेहरा मानी जाने वाली सुभद्रा जोशी को बलरामपुर सीट से अटल बिहारी वाजपेयी के मुकाबले मैदान में उतारा और उन्होंने अटल को शिकस्त दी। इस चुनाव के बाद जनसंघ ने इस कार्ड को अपना हथियार बना लिया। दो सीट वाली भाजपा को सत्ता की इस ऊंचाई तक लाने में अब तक यही कार्ड कारगर रहा है। राममंदिर के नाम पर विध्वंसक रूप से खेले गये इस चुनावी खेल को अब उग्र हिंदुत्व में तब्दली किया जा चुका है। नतीजतन नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने और अब हिंदू आतंकवाद शब्द की कारक बनी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारकर फिर से सत्ता की राह तलाशी जा रही है।

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