All were adjusted too!: सब को एडजस्ट भी कर दिया गया!

लोकसभा के आम चुनाव की घोषणा के ठीक एक दिन पहले ही केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपने सभी नेताओं को एडजस्ट कर दिया। नैतिकता की बार-बार दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार का यह पतन शर्मनाक है। जो पार्टी सरकार में बैठी है, उसे पता होता है कि चुनाव की घोषणा कब होगी, ऐसे में उसे संयम दिखाना चाहिए। पर आम तौर पर सरकारें ऐसा करती नहीं हैं, क्योंकि जिस किसी को भी एडजस्ट नहीं किया गया, तो वह बिदक जाएगा। लेकिन यदि ठीक चुनाव के पूर्व एडजस्टमेंट किया गया, तो बिदकने का मौका ही नहीं मिलता। किंतु सरकार की इस चतुराई से उसकी छवि तो गड़बड़ाती ही है, लेकिन चुनाव-घोषणा के कुछ घंटे पूर्व ऐसा किया गया। मजे की बात कि नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाला आरएसएस स्वयं ही इस पापाचार में शरीक था।

सैकड़ों लोगों को किसी न किसी आयोग का चेयरपर्सन अथवा किसी और पद से नवाजा गया। कई रूठे राजनयिकों को मंत्री दर्जा मिल गया। इससे पार्टी के अन्दर जो कुछ भी खुदुर-बुदुर थी, वह शांत हो गई। लेकिन सरकार के ही इस कृत्य को आड़े हाथों ले लिया, भाजपा के ही एक पूर्व विधायक और वरिष्ठ पत्रकार रूप चौधरी ने। रूप चौधरी को केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड में नामित किया। खुद भाजपा के संगठन मंत्री और वरिष्ठ आरएसएस नेता रामलाल भी उन्हें इस बोर्ड में लेने को आतुर थे। लेकिन रूप चौधरी ने विनम्रतापूर्वक यह पद ठुकरा दिया। उन्होंने लिखा है, कि परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, भाजपा के महामंत्री संगठन श्रद्धेय रामलाल जी व कृषि मंत्री श्री राधामोहन सिंह जी द्वारा मुझे कृषि मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (मुख्यालय हैदराबाद) में नामित करने पर हार्दिक धन्यवाद। चूँकि इस विभाग ओर मत्स्य पालन का मुझे किसी भी प्रकार का अनुभव नही है, और मेरा परिवार विशुद्ध शाकाहारी है। मेरे पूज्य गुरुदेव स्वामी परमानन्द जी महाराज, गुरु-बहन पूज्य साध्वी रितंभरा जी, मेरा परिवार, मेरा जमीर कभी भी मुझे इस प्रकार का पद ग्रहण करने की इजाजत नही दे सकता, जो किसी भी जीव की हत्या से जुड़ा हो। इसलिए माननीय कृषि मंत्री जी को विनम्रतापूर्वक मना कर दिया है, कि इस पद पर मेरे स्थान पर किसी सुयोग्य नेता को नामित कर दें। जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है। मैं पार्टी की यथायोग्य सेवा करता रहूँगा। पार्टी हाईकमान का हृदय से आभारी हूं।
यह सरकार की नाकामी है, कि केन्द्रीय मंत्री महोदय ने एडजस्ट करने की हड़बड़ी में यह जानने की कोशिश भी नहीं की, कि जिसे वे नियुक्त कर रहे हैं, उसकी अपनी इच्छा क्या है। एक ऐसे नेता को, जिसका जमीर अभी मरा हुआ नहीं है, वह भला क्योंकर एक ऐसा प्रस्ताव स्वीकार कर ले, जिसे पूरा करने के लिए उसे अपनी परंपराओं, सिद्धांतों और नैतिकता से समझौता करना पड़ता। लेकिन रूप चौधरी जैसा साहस दिखाने वाले नेता कितने हैं! यहाँ तो पार्टी के अन्दर ऐसी मारामारी मची है कि जो जिसे मिला, वह उसे ले भागा। यह उस पार्टी की सरकार का नैतिक पतन है, जो अपने पूरे कार्यकाल में कांग्रेस को कोसती रही। जिसने एक भी ऐसा काम नहीं किया, जिसके कारण उसका चरित्र उज्ज्वल होता! नरेंद्र मोदी सरकार अपने पूरे कार्यकाल में चुनावी मोड में ही रही। उसने येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस को ही देश की हर गड़बड़ी की वजह बताया. लेकिन सवाल यह है, कि वह अब क्यों वही सब दांव-पेंच कर रही है।

याद करिए, जब 2014 लोकसभा चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री भूमि अधिग्रहण बिल पास करवा रहे थे, तब यही भारतीय जनता पार्टी कह रही थी, कि जिस सरकार को अभी तक किसानों की याद नहीं आई, वह अब किसानों की खैर-ख्वाह बनने का नाटक कर रही है। मगर खुद भाजपा सरकार को भी किसानों की याद तब ही आई, जब चुनाव सिर पर हैं। किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा। खाद-पानी आदि का घोर संकट है, किंतु अहंकार में डूबी मोदी सरकार खुशहाल भारत का राग अलाप रही है। सत्य तो यह है, कि मोदी सरकार के राज में न तो किसान खुशहाल हुआ न मजदूर न विद्यार्थी न औरतें। रोजगार है नहीं, सरकारी कंपनियां लगातार डूब रही हैं और सरकार किसी भी तरह की अराजकता पर अंकुश नहीं लगा पा रही। तब फिर कैसे माना जाए, कि भारत खुशहाल है। वर्ष 2004 में अटलबिहारी वाजपेयी के समय भी ‘शाइनिंग इंडिया’ का नारा चला था। लेकिन दूर-दराज बैठे आम जन को किसी भी कोने से इंडिया शाइनिंग नहीं दिख रहा था। नतीजा यह रहा कि वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा।

बेहतर यह होता, कि सरकार इस वस्तुगत स्थिति से रू-ब-रू होती कि देश की आम जनता बेहाल है। लोगों के पास नौकरी नहीं है, पैसा नहीं है। कौशल विकास की बड़ी-बड़ी बातें की गईं, किंतु कितना कौशल विकास हुआ? किस क्षेत्र में लोगों को रोजगार मिला? कितने लोगों को अपना रोजगार खड़ा करने का अवसर मिला? बैंकों ने कितने लोगों को कर्ज दिया? इसका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। सच तो यह है, कि बैंकों से कर्ज उन्हें मिला, जो बैंक कर्ज लेकर भाग गए। तब फिर हम कैसे मान लें, कि सरकार अपने दावे- ‘सबका साथ, सबका विकास!’ पर खरी उतरी है। मोदी सरकार की हड़बड़ी ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। लोकतंत्र में कोई भी दल या राजनेता न तो स्थायी होता है न अपरिहार्य। लोकतंत्र किसी भी नेता या दल से बड़ा है। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सच्चाई को समझा होता तो वे न तो कभी हड़बड़ी करते और न ही कभी स्वयं को ही सबसे ऊपर समझते। वे कभी कांग्रेस-मुक्त भारत जैसे अमूर्त बातों का आह्वान करते।

उनको ध्यान रखना चाहिए था, कि कोई भी राजनीतिक विचारधारा कभी नष्ट नहीं होती। फौरी तौर पर वह विचारधारा मंद तो पड़ सकती है, लेकिन खत्म नहीं होती। इस तरह की बात कोई भी राजनीतिक कभी नहीं करेगा। मगर प्रधानमंत्री जी पूरे पांच साल ऐसी ही कल्पनाओं में विचरते रहे कि वे देश से कांग्रेस को साफ कर देंगे। यह अति आत्म-विश्वास का ही नतीजा है, कि कांग्रेस के जिन राहुल गांधी को वे राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर और अपरिपक्व मानते थे, वही राहुल गांधी आज उनके समक्ष चुनौती बन कर खड़े हैं।

-शंभूनाथ शुक्ल

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