Home धर्म ज्योतिष् According to astrology, celebrating Janmashtami on Friday, 23 August, will remain meaningful, best and scriptural:ज्योतिष के अनुसार 23 अगस्त , शुक्रवार को ही जन्माष्टमी मनाना रहेगा सार्थक, श्रेष्ठ एवं शास्त्र सम्मत

According to astrology, celebrating Janmashtami on Friday, 23 August, will remain meaningful, best and scriptural:ज्योतिष के अनुसार 23 अगस्त , शुक्रवार को ही जन्माष्टमी मनाना रहेगा सार्थक, श्रेष्ठ एवं शास्त्र सम्मत

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लगभग हर वर्ष जन्माष्टमी के व्रत तथा सरकारी अवकाश में असमंजस की स्थिति बनी रहती है। इसके कई कारण एवं ज्योतिषीय नियम हैं जिन्हें हम यहां सपष्ट कर रहे हैं और आप अपनी सुविधा एवं आस्थानुसार इस पर्व को उल्लास से मना सकते हैं। वास्तव में कृष्णोत्सव एक दिन का नहीं अपितु 3 दिवसीय पर्व है जो 23 अगस्त से लेकर 25 अगस्त तक इस वर्ष मनाया जाएगा।

कुल मिलाकर, शास्त्रानुसार एवं ज्योतिषीय आधार पर इसे 23 अगस्त शुक्रवार के दिन ही श्रीकृष्ण- जन्माष्टमी का व्रत, चंद्रमा को अर्घ्य, दान तथा कृष्ण जन्म से संबंधित अन्य पूजन कार्य करने शास्त्र-सम्मत होंगे। 24 तारीख शनिवार को व्रत का पारण करना चाहिए।

क्या कहते है पंचांग ?

पंचाग को देखें तो अष्टमी तिथि 23 अगस्त को ही सुबह 8.09 बजे से शुरू हो रही है और यह 24 अगस्त को सुबह 8.32 बजे खत्म होगा। वहीं, रोहिणी नक्षत्र 24 अगस्त को सुबह 3.48 बजे से शुरू होगा और ये 25 अगस्त को सुबह 4.17 बजे उतरेगा। जानकारों का मत है कि भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस लिहाज से यह दोनों संयोग 23 अगस्त को बन रहे हैं। ऐसे में 23 अगस्त को जन्माष्टमी मनाना शुभ होगा। हालांकि, कई जानकार 24 अगस्त को इस बार जन्माष्टमी मनाना शुभ मान रहे हैं।

जन्माष्टमी में पूजा का शुभ मुहूर्त

जन्माष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त 23 अगस्त को रात 12.08 बजे से 1.04 बजे तक है। मान्यताओं के अनुसार व्रत का पारण अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र उतरने के बाद ही करना चाहिए। अगर दोनों संयोग एक साथ नहीं बन रहे हैं तो अष्टमी या फिर रोहिणी नक्षत्र उतरने के बाद आप व्रत तोड़ सकते हैं। ऐसे ही 24 अगस्त को पूजा का मुहूर्त 12.01 बजे से 12.46 बजे तक का है। पारण का समय सुबह 6 बजे के बाद है।

दही हांड़ी का पर्व 25 अगस्त 2019, रविवार को किया जाएगा।

कृष्ण जन्म कब हुआ था?

भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के मध्यरात्रि के रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। कृष्ण जी का जन्म कंस के कारागार में बंद वासुदेव-देवकी की आठवीं संतान के रूप में हुआ था।

स्मार्त और वैष्णव दोनों ही समुदायों के लिए इस पर्व का बहुत खास महत्व माना जाता है। इस दिन सभी भक्तगण भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरुप का श्रृंगार करते हैं, उन्हें सजाते हैं, नए वस्त्र पहनाते हैं। कृष्ण मंदिरों में इस दिन अलग ही रौनक देखने को मिलती है। वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में हजारों श्रद्धालु इस दिन श्री कृष्ण के दर्शन करने यहाँ आते हैं। इस दिन श्री कृष्ण को झूला झूलने का भी बहुत खास महत्व होता है।

इस बार 23 अगस्त , शुक्रवार को स्मार्त अर्थात गृहस्थी लोग जन्माष्टमी मनाएंगे क्योंकि इस दिन कई दुर्लभ योग हैं । इस लिए, इसी समय, भगवान के निमित्त व्रत, बालरुप पूजा, झूला झुलाना, चंद्र का अर्घ्य, दान, जागरण, कीर्तन आदि का विधान होगा।

अगले दिन 24 अगस्त , शनिवार को ,वैष्णव अर्थात सन्यासी आदि यह जन्मोत्सव इसी दिन मनाएंगे । परंपरानुसार एवं स्थानीय परिस्थितिवश मथुरा व गोकुल में हर बार की तरह भगवान कृष्ण के जन्म पर नन्दोत्स्व अगले दिन मनाया जा रहा है। भारत के कई नगरों में मथुरा की परंपरा के अनुसार चला जाता है परंतु शुद्ध ज्योतिष के आधार पर ही व्रत एवं महोत्सव मनाने का अपना ही महत्व एवं सार्थकता रहती है।

क्या है स्मार्त तथा वैष्णव ? क्यों रहता है दो दिनों का संशय ?

वेद, श्रुति-स्मृति, आदि ग्रंथों को मानने वाले धर्मपरायण लोग स्मार्त कहलाते हैं। प्रायः सभी गृहस्थी स्मार्त कहलाते हैं। जबकि वे लोग जिन्होंने किसी प्रतिष्ठित वैष्णव संप्रदाय के गुरु से दीक्षा ग्रहण की हो, दीक्षित हों, कण्ठमाला धारण की हो, किसी प्रकार का तिलक लगाते हों, ऐसे भक्तजन वैष्णव कहलाते हैं।

गृहस्थ जीवन वाले वैष्णव संप्रदाय से जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं और साधु संत स्मार्त संप्रदाय के द्वारा मनाते हैं. स्मार्त अनुयायियों के लिए, हिंदू ग्रन्थ धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिए स्पष्ट नियम हैं. जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयाई नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिंदू ग्रंथ में बताए गए नियमों के आधार पर करना चाहिए.

इस अंतर को समझने के लिए एकादशी उपवास एक अच्छा उदाहरण है. एकादशी के व्रत को करने के लिए, स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदायों के अलग-अलग नियम होते हैं. ज्यादातर श्रद्धालु एकादशी के अलग-अलग नियमों के बारे में जानते हैं लेकिन जन्माष्टमी के अलग-अलग नियमों से अनभिज्ञ होते हैं. अलग-अलग नियमों की वजह से न केवल एकादशी के दिनों बल्कि जन्माष्टमी के दिनों में एक दिन का अंतर होता है.

वैष्णव और स्मार्त संप्रदाय की जन्माष्टमी के नियम

वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग उदया तिथि को प्राथमिकता देते हैं. उदया तिथि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि के दिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं. वैष्णव नियमों के अनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी /नवमी तिथि पर ही पड़ता है.

जन्माष्टमी का दिन तय करने के लिए, स्मार्त धर्म द्वारा अनुगमन किए जाने वाले नियम अधिक जटिल होते हैं. इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिंदू अर्धरात्रि का समय है, को प्राथमिकता दी जाती है. जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है. इन नियमों में रोहिणी नक्षत्र को सम्मिलित करने के लिए कुछ और नियम जोड़े जाते हैं.

जन्माष्टमी के दिन का अंतिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन के आधार पर किया जाता है. स्मार्त नियमों के अनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन हमेशा सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि के दिन पड़ता है.

व्रत कब और कैसे रखा जाए?

व्रत के विषय में इस बार किसी प्रकार भी भ्रांति नहीं हैं। फिर भी कई लोग, अर्द्धरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी और अष्टमी पर व्रत रखते हैं। कुछ भक्तगण उदयव्यापिनी अष्टमी पर उपवास करते हैं।

शास्त्रकारों ने व्रत -पूजन, जपादि हेतु अर्द्धरात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी। विशेषकर स्मार्त लोग अर्द्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल,चंडीगढ़ आदि में में स्मार्त धर्मावलम्बी अर्थात गृहस्थ लोग गत हजारों सालों से इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अर्द्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं। जबकि मथुरा, वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की परंपरा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही केन्द्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है। वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत हेतु ग्रहण करते हैं।

सुबह स्नान के बाद ,व्रतानुष्ठान करके ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें । पूरे दिन व्रत रखें । फलाहार कर सकते हैं। रात्रि के समय ठीक बारह बजे, लगभग अभिजित मुहूर्त में भगवान की आरती करें। प्रतीक स्वरुप खीरा फोड़ कर , शंख ध्वनि से जन्मोत्सव मनाएं। चंद्रमा को अर्घ्य देकर नमस्कार करें । तत्पश्चात मक्खन, मिश्री, धनिया, केले, मिष्ठान आदि का प्रसाद ग्रहण करें और बांटें। अगले दिन नवमी पर नन्दोत्सव मनाएं।

भगवान कृष्ण की आराधना के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं-

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिशां पते!

नमस्ते रोहिणी कान्त अर्घ्य मे प्रतिगृह्यताम्!!

स्ंातान प्राप्ति के लिए –

इस की इच्छा रखने वाले दंपत्ति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति -पत्नी दोनों मिल कर करें, अवष्य लाभ होगा।

मंत्र है- देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते!

देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः!!

दूसरा मं़त्र-

! क्लीं ग्लौं श्यामल अंगाय नमः !!

विवाह विलंब के लिए मंत्र है-

ओम् क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्ल्भाय स्वाहा।

इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजन के साथ-साथ व्रत रखना भी बहुत फलदायी माना जाता है। कहा जाता है, कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने से बहुत लाभ मिलता है। कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत को व्रतराज भी कहा जाता है। इस व्रत का विधि-विधान से पालन करने से कई गुना पुण्य की प्राप्ति होती है।

जन्माष्टमी का व्रत रात बारह बजे तक किया जाता है। इस व्रत को करने वाले रात बारह बजे तक कृष्ण जन्म का इन्तजार करते हैं। उसके पश्चात् पूजा आरती होती है और फिर प्रसाद मिलता है। प्रसाद के रूप में धनिया और माखन मिश्री दिया जाता है। क्यूंकि ये दोनों ही वस्तुएं श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं। उसके पश्चात् प्रसाद ग्रहण करके व्रत पारण किया जा सकता है। हालाँकि सभी के यहाँ परम्पराएं अलग-अलग होती है। कोई प्रातःकाल सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं तो कोई रात में प्रसाद खाकर व्रत खोल लेते हैं। आप अपने परिवार की परम्परा के अनुसार ही व्रत पारण करें।

जन्माष्टमी के दिन साधक को अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। फलाहार किया जा सकता है। व्रत अष्टमी तिथि से शुरू होता है। इस दिन सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद घर के मंदिर को साफ सुथरा करें और जन्माष्टमी की तैयारी शुरू करें। रोज की तरह पूजा करने के बाद बाल कृष्ण लड्डू गोपाल जी की मूर्ति मंदिर में रखे और इसे अच्छे से सजाएं। माता देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा जी का चित्र भी लगा सकते हैं।

दिन भर अन्न ग्रहण नहीं करें। मध्य रात्रि को एक बार फिर पूजा की तैयारी शुरू करें। रात को 12 बजे भगवान के जन्म के बाद भगवान की पूजा करें और भजन करें। गंगा जल से कृष्ण को स्नान करायें और उन्हें सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान को झूला झुलाए और फिर भजन, गीत-संगीत के बाद प्रसाद का वितरण करें।

जन्माष्टमी हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। जिसे बाल गोपाल श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व को केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पूरी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है।

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