Home विचार मंच Accepting the challenge of Haryana is not easy for anyone: हरियाणा की चुनौती स्वीकारना किसी के लिए आसान नहीं

Accepting the challenge of Haryana is not easy for anyone: हरियाणा की चुनौती स्वीकारना किसी के लिए आसान नहीं

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हरियाणा का गढ़ जीतना इस बार भाजपा नेतृत्व के लिए अगर बड़ी चुनौती है तो कांगे्रस, आप और जजपा के लिए भी बहुत आसान नहीं है। इस बार मतदाता मौन है और उसके रुख को भांप पाना हंसी-खेल बिल्कुल भी नहीं है। 2014 के तीन लोकसभा सीटों पर जहां भाजपा 2014 के चुनाव में कमल नहीं खिला पाई थी, वहां तो कमल खिलाने की उसकी कोशिश है ही , जीती हुई सात सीटों पर भी उसे अपना वर्चस्व बनाए रखना है। हरियाणा की सभी सीटों पर कमल खिलाना इस बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है। इसके लिए वह राज्य की सभी दस लोकसभा और 90 विधानसभा सीटों पर अनथक प्रयास भी कर रहे हैं। रोड शो और प्रचार कार्यक्रमों के जरिए वे विरोधी दलों को शिकस्त देने में जुटे भी हैं। जननायक जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी का गठबंधन उन्हें परेशान तो कर रहा है लेकिन उतना नहीं जितनी अपेक्षा थी। अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच हरियाणा में गठबंधन हो गया होता तो तस्वीर का रुख कुछ और होता। जननायक जनता पार्टी की हवा तो इनेलो ही निकाल देगी। जिस तरह इनेलो ने अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं उससे जजपा प्रत्याशियों की परेशानी तय है। बसपा और राजकुमार सैनी के दल से गठबंधन से भी थोड़ी उम्मीदें थीं लेकिन हुड्डा के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाले राजकुमार सैनी ने जिस तरह सुनियोजित बहाने से खुद को चुनाव लड़ने से अलग किया है, उसे लेकर आम जन के बीच उनकी नीति और नीयत पर ही सवाल उठने लगे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि राजकुमार सैनी कहीं डबल गेम तो नहीं कर रहे हैं। वैसे लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हरियाणा में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। हरियाणा की सभी संसदीय सीटों के महारथी तय हो गए हैं। सभी दलों ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं। इससे चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है। भाजपा से वीरेंद्र सिंह ने जहां राजनीतिक संन्यास लेने की घोषणा कर दी है, वहीं कांग्रेस से उद्योगपति सांसद नवीन जिंल भी इस बार कुरुक्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा की रोहतक सीट पर उनके बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा जहां जोर आजमा रहे हैं, वहीं भूपेंद्र हुड्डा इस बार सर्वाधिक नए क्षेत्र सोनीपत में अपनी जीत की आकांक्षा पाले हुए हैं। आप की हरियाणा इकाई के प्रधान पं. नवीन जयहिंद फरीदाबाद में और जजपा संरक्षक दुष्यंत चौटाला हिसार में लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं जबकि उनके छोटे भाई दिग्विजय चौटाला सोनीपत में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव जीतने की व्यूहरचना तेज हो गई है। सभी दल एक दूसरे को घेरने की रणनीति बना रहे हैं। राज्य में छठे चरण में 12 मई को मतदान होना है। राज्य मंत्री नायब सिंह सैनी को भाजपा के प्रत्याशी के रूप में कुरुक्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा गया है, जबकि पूर्व मंत्री निर्मल सिंह को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया है। खास बात यह है कि दोनों ही नेता पहली बार, लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि इससे पहले दोनों नेता विधानसभा चुनाव तक सीमित थे। दोनों के समर्थक भी कुरुक्षेत्र में डटे हुए हैं, जिसके चलते अंबाला लोकसभा सीट के समीकरण भी प्रभावित होना तय हैं। भाजपा के टिकट पर राज्य मंत्री नायब सिंह सैनी और कांग्रेस के टिकट पर पूर्व मंत्री निर्मल सिंह भी अपने घर अंबाला से बाहर कुरुक्षेत्र में अपने राजनीतिक जीवन की नई पारी खेल रहे हैं। लोकसभा चुनाव लड़ने का इन दोनों का पहला तजुर्बा है। ये अभी तक विधायक का चुनाव ही जीते हैं लेकिन इस बार दोनों कुरुक्षेत्र में एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं। कुरुक्षेत्र के पूर्व सांसद नवीन जिंदल के चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। ऐसा उन्होंने क्यों किया, यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन इस चक्कर में अंबाला से चुनाव लड़ रही कांग्रेस की कद्दावर नेता कुमारी सैलजा का सपोर्ट सिस्टम कमजोर हो गया है। 2004 और 2009 के उनके चुनाव में पूर्व मंत्री निर्मल सिंह ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया था। उनके रोड शो में भूपेंद्र हुड्डा की उपस्थिति उन्हें मानसिक संबल तो देती है लेकिन अपने और बेटे की सीट से वे उनके लिए कितना समय निकाल पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। वैसे भूपेंद्र हुड्डा राज्य में कांग्रेस के स्टार प्रचारक भी हैं लेकिन उनकी स्थिति कुल मिलाकर ‘आपन झुलनी संभारूं कि तोयं बालमा’ वाली ही होकर रह गई है। चाहकर भी वे अपने बूथ कार्यकर्ताओं में नरेंद्र मोदी जैसी फीलिंग विकसित नहीं कर सकते। कार्यकर्ता खुद को हुड्डा मानें या राहुल मानें, ऐसा माहौल अभी तक तो बना नहीं है। आगे क्या होगा, कहा नहीं जा सकता। हरियाणा में लोकसभा चुनाव 2019 की जंग इसलिए भी अहम है क्योंकि इस बार कई राजनीतिक दिग्गज अपनी परंपरागत सीटों को छोड़कर नई सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में वहां उन्हें पसीने छूटने लगभग तय हैं। जीत से पहले इन प्रत्याशियों को मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सोनीपत में अपने पारिवारिक संबंधों का वास्ता देते हुए चुनाव प्रचार आरंभ कर दिया है। आम आदमी पार्टी के नवीन जयहिंद रहने वाले तो रोहतक के हैं लेकिन वे चुनाव लड़ रहे हैं, फरीदाबाद लोकसभा सीट से। जननायक जनता पार्टी (जजपा) नेता दिग्विजय चौटाला जींद विधानसभा का उपचुनाव हार गए थे और अब वे सोनीपत से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। दिग्विजय के लिए यह इलाका और वहां के मतदाता भी नए हैं लेकिन दिग्विजय को उम्मीद है कि इस सीट पर उनके प्रपितामह देवीलाल का प्रभाव उनकी चुनावी नौका को पार लगा सकता है। 1980 के लोकसभा चुनाव में देवीलाल ने यहां से चुनाव जीते थे। दिग्विजय ने देवीलाल चौटाला की मूर्ति के सामने नतमस्तक होकर अगर अपना चुनावी अभियान शुरू किया है तो उसके अपने मायने हैं। वे चुनावी बैतरणी पर सवार होकर अपने लिए जीत की गुंजाइश तलाश रहे हैं। 1996 में सोनीपत से और 2004 व 2009 में करनाल सीट से सांसद रह चुके अरविंद शर्मा इस बार रोहतक से चुनाव लड़ रहे हैं। यह और बात है कि इस बार वे करनाल सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन भाजपा ने उन्हें रोहतक का जाटलैंड जीतने की जिम्मेदारी सौंप दी है। यह उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। राजकुमार सैनी के चुनाव न लड़ने की एक वजह यह भी हो सकती है कि ऐसा करने से जाटलैंड में उनकी पार्टी के लिए माहौल खराब हो सकता था। यूं तो मनोहर लाल खट्टर रोहतक में कमल खिलाने को पूरी तरह बेताब हैं और यह कहने में कदाचित चूक नहीं रहे हैं कि रोहतक में कभी भावनात्मक तो कभी अपनेपन के नाम पर वंशवाद की बेल पनपती रही है। लोग वंशवाद की इस बेल को खत्म कर समान विकास और सुशासन की राह पर आगे बढ़ें। जननायक जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष निशान सिंह कंबोज द्वारा राम रहीम की तुलना गुरु गोबिंद सिंह से करके सिख समाज का गुस्सा मोल लिया है। सिख समाज उनके निष्कासन तथा अकाल तख्त साहिब के समक्ष हाजिर होकर उनसे माफी मांगने की मांग कर रहे हैं। सिखों द्वारा राज्य में उनके पुतले फूंके जा रहे हैं। इसका खामियाजा जननायक जनता पार्टी को भुगतना पड़ सकता है। वैसे ही चौटाला परिवार से बादल परिवार के अब पहले जैसे रिश्ते नहीं रहे। लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल भाजपा के साथ है। इनेलो की नाराजगी पहले ही जजपा झेल रही है। ऐसे में वह खास कुछ कर पाएगी, इसके आसार नजर नहीं आ रहे। देखना यह होगा कि इस बार हरियाणा का साथ किसे मिलता है।
शिवकुमार शर्मा
(लेखक इंडिया न्यूज के डिप्टी एडिटर हैं।)

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