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 आचरण में बदलाव से होगा पर्यावरण संरक्षण

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श्रीराम माहेश्वरी/भारतीय संस्कृति में प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का अहम स्थान है। आदिकाल से हम वृक्षों की पूजा करते आ रहे हैं। पूजा के आरंभ में जल कलश में गंगा सहित सप्त नदियों और समुद्र के जल का आह्वान करते हैं। मंत्रोच्चार द्वारा जल की आराधना करते हैं। इसी तरह भूमि,वायु और नवग्रहों की पूजा करते हैं। जाहिर है, पंचतत्वों से बनी इस सृष्टि के प्रति हमारी उदारता और आदर की भावना हमारे संस्कारों में है। इन अच्छाइयों के बावजूद भौतिक लालसा के अवगुणों ने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन मनुष्य ने किया और कर रहा है, इसका परिणाम है – जलवायु परिवर्तन। तापमान में हर साल वृद्धि हो रही है।
समूचे विश्व में आज बिगड़ते पर्यावरण के हालात पर चर्चा हो रही है। विकसित देश हों या विकासशील सभी का चिंतन है- पृथ्वी वायु और जल में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए ठोस और स्थायी उपाय हों। – वैसे मौसमी बदलाव के लिए प्राकृतिक और मानवजनित दोनां तरह के अनेक कारण हैं, परन्तु हमें औद्योगीकरण, शहरकरण, और बढ़ती आबादी के प्रति गंभीरता से सोचना होगा। जल, जंगल और जमीन के प्राकृतिक रिश्तों पर बढ़ते मानवीय दखल को रोकना होगा। अपने आचरण और दिनचार्या में बदालाव लाकर हमें प्राकृतिक संसाधनों के सीमित उपयोग पर बल देना होगा, तभी हम वनस्पति, फल, अनाज और जल की आपूर्ति आबादी की मांग के अनुरूप करने में समर्थ हो सकेंगे।
पर्यावरण एक प्राकृतिक परिवेश है, जो धरती पर सभी उपलब्ध जैविक-अजैविक घटकों के जीवन को सुरक्षित रखने में मदद करता है। हमारे आसपास का ऐसा वातावरण जहां वायु, जल और भूमि के समन्वय से जीवमंडल के विकास और जीवन के पोषण की सतत प्रक्रिया चलती हो। शुरू में मनुष्य का प्रकृति के साथ संतुलित रिश्ता रहा, परन्तु जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी का विकास होता गया, उसके व्यवहार में बदलाव आता गया। शुरू में वह प्रकृति का अंग था और आज वह प्रकृति का स्वामी बन बैठा है। मनुष्य की इस भावना के कारण अनेक पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दिया है। मानवीय गतिविधियों से पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इनमें प्रमुख है- बढ़ता औद्योगीकरण, अत्यधिक खनन, शहरीकरण, परम्परागत खेती छोडक़र आधुनिक खेती का बढ़ता चलन और आधुनिक प्रौद्योगिकी।
औद्योगीकरण के कारण जल और वायु प्रदूषण बढ़ा। इससे मानव तथा अन्य जीवों पर दुष्प्रभाव हुआ। दूसरा कृषि के क्षेत्र में ज्यादा नुकसान हुआ। ज्यादा फसल लेने के लालच में देश में कृत्रिम उर्वरकों का उपयोग किया गया। कीटनाशकों के प्रयोग से साथ वे कीट भी मर जाते हैं, जो कृषि की परागण क्रिया में सहायक होते हैं। रासायनिक खाद के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट होती है। उसके पोषक तत्वों में कमी आती है। शहरीकरण वह कारण है, जिससे ग्रामीण आबादी का शहरों में पलायन होता है और आबादी का दबाव बढऩे से वहां खाद्य संकट, निवास, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति जैसे सडक़, बिजली, पेयजल तथा आवागमन के साधनों में वृद्धि होती है। कृषि भूमि को नष्ट करके शहर गांव की ओर बढ़ रहे हैं। इससे उत्पादकता पर प्रभाव पड़ रहा है। शहरों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए वन संपदा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वृक्षों की कटाई से जंगल नष्ट हो रहे हैं। परिणामस्वरूप वर्षा चक्र और जल चक्र प्रभावित हो रहा है।
पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है, जहां जीवन है और जीवन का आधार है जल। पृथ्वी के तीन हिस्से में जल उपलब्ध है। देश की नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनने से उनके जल प्रवाह को रोका गया है। यह अप्राकृतिक कृत्य है। एक नदी जब अपने प्राकृतिक प्रवाह के साथ चलती है तो वह अपने साथ अनेक पोषक तत्वों को लेकर चलती है। नदी के जल से नद और फिर सागर आकार लेता है। जिन नदियों को हम प्राचीनकाल से पूजते आ रहे हैं उनके जल से हमें जीवन मिला और बदले में मनुष्य ने दिया प्रदूषण। उनके प्रवाह को रोककर या मोडक़र हम नदियों के अस्तित्व को समाप्त करते जा रहे हैं। गंगा नदी में 56 और यमुना में 26 बड़े बांध बनाये गए। हिमालय की अनेक नदियों पर एक हजार के करीब छोटे-बड़े बांध बना दिये गए। देश की अन्य नदियों में देखा जाए तो साढ़े पांच हजार के करीब बांध बने हैं। नर्मदा नदी को ही देखें, जिस पर पांच बड़े 30 मध्यम और सवा सौ छोटे बांध बना दिये गए।
ऐसा करने से उसका प्रवाह रूक गया। नतीजतन समुद्र से साठ किमी पहले ही उसका पानी ठहर गया। दूसरी तरफ समुद्र का खारा पानी बढ़ रहा है। वह मीठे पानी में मिल रहा है। विडम्बना यह है कि मध्यप्रदेश और गुजरात के किसानों को नर्मदा का पानी उपलब्ध नहीं है, जबकि उद्योगों को नर्मदा का पानी दिया जा रहा है। नदियों पर अनेक बांध ऐसे हैं, जिन से बिजली नहीं बन रही लेकिन बांध के कारण उनका प्रवाह रूक गया है। जल नहीं होने से नदियों की जैव-विविधता संकट में है। दिल्ली में यमुना में 19 नालों का गंदा पानी मिल रहा है। उच्च न्यायालय और एनजीटी ने नदियों के प्रवाह न रोकने के अनेक बार आदेश दिये परन्तु पालन नहीं हो रहा है। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने 2017 में गंगा-यमुना नदी को मानव का दर्जा दिया है, किन्तु आश्चर्य की बात है कि नदियों में प्रदूषण को रोकने की ठोस कार्रवाई अभी तक सामने नहीं आ सकी है। गंगा नदी के प्रदूषण को रोकने की येाजना अभी तक धरातल पर नहीं आ सकी। यह पवित्र नदियों के साथ घोर अन्याय है।
मनुष्य के आचरण में यदि बदलाव नहीं आया तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखायेगी। भौतिक लालसा और विकास की आंधी में मनुष्य की बुद्धि कुण्ठित होती जा रही है और उसकी आंखों पर जैसे पट्टी बंधी है। इस कारण वह आने वाली पीढिय़ों को देने के लिए प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है। पर्यावरण का संरक्षण केवल सरकार की नहीं, हर मनुष्य की जिम्मेदारी है।

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